💐💐 #daduji 💐💐
३४६. पतिव्रत । राज विद्याधर ताल ~
मूल सींच बधै ज्यों बेला, सो तत तरुवर रहै अकेला ॥ टेक ॥
देवी देखत फिरै ज्यों भूलै, खाइ हलाहल विष को फूलै ।
सुख को चाहे पड़ै गल फाँसी, देखत हीरा हाथ तैं जासी ॥ १ ॥
केई पूजा रच ध्यान लगावैं, देवल देखैं खबर न पावैं ।
तोरैं पाती जुगति न जानी, इहि भ्रम भूल रहै अभिमानी ॥ २ ॥
तीर्थ व्रत न पूजै आसा, वन खंड जाहिं रहैं उदासा ।
यूं तप कर - कर देह जलावै, भरमत डोलैं जन्म गवावैं ॥ ३ ॥
सतगुरु मिलै न संशय जाई, ये बँधन सब देइ छुड़ाई ।
तब दादू परम गति पावै, सो निज मूरति मांहि लखावै ॥ ४ ॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव संतरूप पतिव्रता का स्वरूप दिखा रहे हैं कि हे जिज्ञासु ! जैसे वृक्ष के मूल को सींचने से वृक्ष के डाल - पत्ते - फल - फूल, सभी सिंच जाते हैं, बेली के मूल को सींचने से बेली बढ़ती है, ऐसे ही सबके मूल तत्व परब्रह्म की उपासना करने से सबकी उपासना हो जाती है । हे परमेश्वर को भूले हुए प्राणी ! देवी, देव आदि तो पत्तों के समान विनाशी हैं, अद्वैत ब्रह्म ही एक स्थिर है ।
जैसे कोई हलाहल विष खाकर मृत्यु को भूला हुआ फूला फिरता हो, वैसे ही देवी के उपासक देवी के दर्शन करके तथा माँस मदिरा आदि अभक्ष्य भक्षण, अपेय पान करके, उनके परिणाम में होने वाले दुःख को भूल कर फूले फिरते हैं । वे चाहते तो सुख को हैं, किन्तु अन्त में उनके गले में यम - पाश ही पड़ती है । ऐसे लोगों का मानव - जन्म - हीरा देखते - देखते ही हाथ से चला जाता है । कितने ही अन्य देवताओं की पूजा करके ध्यान करते हैं । देव - मंदिर में जाकर देवता का दर्शन करते हैं, किन्तु वे अपने आत्मा स्वरूप प्रभु का कुछ भी ज्ञान प्राप्त नहीं करते । अभिमानी होने के कारण संतों के पास जाकर प्रभु उपासना की युक्ति न जानने से अति मात्रा में तुलसी विल्व - पत्र आदि तोड़ कर चढ़ाने से ही क्या प्रभु मिल जायेंगे ? इस भ्रम से अन्तर साधन भूल रहे हैं ।
ग्राम से विरक्त हो वन के भयंकर क्षेत्र में जाकर रहने से, तीर्थ - व्रत करने से प्राणी की आशा पूर्ण नहीं होती । इस प्रकार तपस्या करके तथा पँच धूनी तप कर शरीर को जलाते हैं । भ्रम - वश इधर - उधर घूमते हुये अपने मानव जीवन जन्म को खो देते हैं । उन्हें जब तक सतगुरु न मिलें, तब तक उनका संशय दूर नहीं होता । सतगुरु मिल जाएँ तो, ये उक्त सभी बन्धन रूप कर्म छुड़ा दें । जो प्रभु पतिव्रत से युक्त प्रभु उपासना करता है, उसी संत रूप भक्त को प्रभु अपना स्वरूप उसके हृदय में दिखाते हैं । वह जब प्रभु का साक्षात्कार कर लेता है, तब प्रभु से अभेद स्थिति रूप परमगति को प्राप्त करता है ।(पाठा - १पूरै)
If you water the root, the vine grows;
that mighty tree of essential Truth alone remains.*
People are lost in visiting various gods and goddesses.
While eating poison, their joy knows no bounds.
While they seek pleasure, their neck
is caught in the noose.
Within their very sight, the diamond slips
from their hand.
Some perform ceremonial worship
and try to concentrate,
But they see only the temple idol,
having no inkling of the Truth.
They pluck leaves but know not
the true method of worship.
Thus, in delusion, the self-conceited are led astray.
They go on pilgrimage
and practice religious observances,
but their desires are not fulfilled.
They go to the forest,
but there, too, they remain sad.
Offering penances, they burn their bodies.
Thus, they wander around and waste
their lives in various ways.
As long as the Master is not found,
doubts cannot be dispelled.
He alone extricates us from all bondage.
He reveals God within;
Only then do we attain the highest goal, O Dadu.

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