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॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
३४७. साधु परीक्षा । दादरा ~
सोई साधु शिरोमणि, गोविंद गुण गावै ।
राम भजै विषिया तजै, आपा न जनावै ॥ टेक ॥
मिथ्या मुख बोलै नहीं, पर निंदा नाँहीं ।
औगुण छाड़ै गुण गहै, मन हरि पद मांहीं ॥ १ ॥
निर्वैरी सब आतमा, पर आतम जानै ।
सुखदाई समता गहै, आपा नहीं आनै ॥ २ ॥
आपा पर अंतर नहीं, निर्मल निज सारा ।
सतवादी साचा कहै, लै लीन विचारा ॥ ३ ॥
निर्भय भज न्यारा रहै, काहू लिप्त न होई ।
दादू सब संसार में, ऐसा जन कोई ॥ ४ ॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव साधु लक्षणों द्वारा संत की परीक्षा बता रहे हैं कि हे जिज्ञासु ! संतों में वही संत शिरोमणि हैं, जो गोविन्द भगवान् के गुण गाते रहते हैं । और विषियी, स्त्री आदि का संग त्यागकर राम का स्मरण करते हैं । किसी प्रकार का आपा अहंकार नहीं जनाते हैं, मुख से झूठ नहीं बोलते, दूसरों की निन्दा नहीं करते । अपने हृदय में दुर्गुणों का त्याग करके दैवी सम्पदा के गुणों को धारण करते हैं अथवा जीवों के अवगुणों को छोड़कर उनमें जो गुण होते हैं, उनको ग्रहण करते हैं । मन हरि के स्वरूप में जिन्होंने लगाया है, चींटी से लेकर हाथी पर्यन्त में निर्वेर होकर एक आत्म - रूप देखें और आत्मा को ही परमात्मा जानें, समत्व ज्ञान द्वारा सबको सुख देने वाले होवें ।
मिथ्या शरीर का अध्यास नहीं रखते, अपने और पराये में कोई अन्तर नहीं देखते । माया आदि मल रहित, विश्व का सार ब्रह्म को निज आत्म - स्वरूप करके जानें । और मन - वचन से सत्य का आचरण करते हैं । विचार के द्वारा सत्य स्वरूप को ग्रहण करके उसी में लयलीन रहते हैं और निर्भय स्वरूप का नाम स्मरण करके माया प्रपँच से अलग रहते हैं । किसी भी पाप और पुण्य में लिपायमान नहीं होते । मुक्त पुुरुष कहते हैं कि सम्पूर्ण संसार में ऐसे संतजन कोई विरले ही होते हैं ।
प्रसंग - उक्त पद को बणजारों के मुख से सुनकर ठट्ठा नगर(कराची) से सिंधी माता रम्भाजी आमेर में श्रीदादूजी के दर्शन करने आई थी ।

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