रविवार, 27 सितंबर 2015


💐💐 #‎daduji‬ 💐💐
॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
३५०. परिचय । एक ताल ~
ये मन मेरा पीव सौं, औरनि सौं नाँहीं ।
पीव बिन पलहि न जीव सौं, यह उपजै मांहीं ॥ टेक ॥ 
देख देख सुख जीव सौं, तहँ धूप न छाहीं ।
अजरावर मन बंधिया, तातैं अनत न जाहीं ॥ १ ॥ 
तेज पुंज फल पाइया, तहाँ रस खाहीं ।
अमर बेलि अमृत झरै, पीव पीव अघाहीं ॥ २ ॥ 
प्राणपति तहँ पाइया, जहँ उलट समाई ।
दादू पीव परचा भया, हियरे हित लाई ॥ ३ ॥ 
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव साक्षात्कार की स्थिति बता रहे हैं कि हे जिज्ञासुओं ! अब तो यह हमारा मन प्रियतम प्रभु के चिन्तन में ही प्रसन्न रहता है, दूसरे मायावी उपास्य देवों में नहीं लगता । हमारे जीव में ऐसा ज्ञान उत्पन्न हुआ है कि पीव के बिना एक पल भी अब जीव से नहीं रहा जाता । उस पीव को देख - देख करके जीव सुखी रहता है । वहाँ न तो मायिक पदार्थों की अप्राप्ति रूप धूप का दुःख ही है और न प्राप्ति की सुख रूप छाया ही है । 
हमारा मन अब उस अजर अमर ब्रह्म में ही बँध रहा है । अब अन्यत्र मायिक पदार्थों मे नहीं जाता है । अब तो ब्रह्म - तेज की प्राप्ति रूप फल प्राप्त हो गया है । उसका दर्शन रूप उपभोग करता है । आत्माकार वृत्ति रूप अमर बेली से जीव ब्रह्म की एकता रूप ज्ञानामृत झरता है । उसको पान करके तृप्त हुए ‘पीव - पीव’ ही रटते रहते हैं । हमने अपने मन इन्द्रियों को बहिर्मुख से अन्तर्मुख उलट कर प्राणों को सत्ता - स्फूर्ति देने वाले चैतन्य रूप पति को हृदय - स्थान में ही प्राप्त किया है । मुक्त पुरुष कहते हैं कि ऐसे जिज्ञासु ही हृदय में हेत सहित परमेश्‍वर से परिचय होते हैं

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