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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-१)"*
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= २२ वां विन्दु चतुर्थदिन =*
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*= राजान्न का त्याग =*
उसी समय जग्गाजी भिक्षा लेकर आये । फिर सब संतों ने भिक्षान्न पाया । इधर राजा भगवतदास बादशाह के पास गया तब बादशाह ने पूछा - दादूजी को हमारी सामग्री से बनाकर भोजन कराया ? राजा ने कहा - वे तो अपनी योग शक्ति से जान गये ।
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मैंने अति सुन्दर भोजन का थाल जब सामने रखा तो उन्होंने उसे अच्छी प्रकार देखा तक नहीं और राजस तथा राजान्न कहकर त्याग दिया, नहीं पाया और बाग में लौट गये । फिर भिक्षान्न ही पाया । तब बीरबल ने कहा - ऐसे संतों को तो उनकी इच्छा पर ही छोड़ देना चाहिये, उनके आगे अपनी इच्छा अनुसार करने से ठीक नहीं रहता है ।
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तब बादशाह ने भी कुछ सोच विचार करके दादूजी को अपना अन्न खिलाने की बात अपने हृदय से निकाल दी और आज्ञा दी कि सत्संग के लिये दादूजी को बुला लाओ । फिर बीरबल दादूजी के पास गये और बुला लाये ।
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दादूजी के आने पर अकबर ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया, फिर दिव्य आसन पर बैठाकर बोला - भगवन् ! अज्ञान का दुःख तो रात्रि दिन बना ही रहता है । आप गुरु हैं, मैं आपका शिष्य हूँ, आप ही मेरा अज्ञान हरेंगे । जो मैं प्रश्न करूं उसका उत्तर देने की कृपा आप अवश्य करेंगे ।
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*= इष्टदेव के धामदि संबन्धी प्रश्न और उत्तर =*
दादूजी ने कहा - आपका कथन यथार्थ है, आप अपनी इच्छानुसार पूछिये । अकबर बोले - आपने अपना इष्टदेव बताया था उसका धाम कौनसा है ? उसके आसपास किसका विश्राम है ? उसका रूप कैसा है ? श्याम है, अथवा गौर है यह भी कहें ?
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दादूजी ने कहा - संतों के इष्टदेव परब्रह्म का धाम ऐसा है जिसको जानकार प्राणी परम विश्राम को पाता है । उसका रूप, रंग नहीं कहा जा सकता । क्योंकि है ही नहीं । नाम रूप सहित और व्यापक उसको ज्ञानी जन कहते हैं ।
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अकबर - आप ब्रह्म को सर्व व्यापक बताते हैं किंतु वह तो देवताओं में भी नहीं है उनसे भिन्न है । वे प्रार्थना करते हैं तब आता है । इससे ज्ञात होता है वह व्यापक नहीं है । दादूजी बोले - ब्रह्म के दो रूप है, एक तो सत्ता रूप सामान्य और दूसरा विशेष । सामान्य रूप सब में भासता है, विशेषरूप सब में नहीं भासता ।
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उसकी ज्योति ऐसी है -
"सूरज कोटि प्रकाश है, रोम रोम की लार ।
दादू ज्योति जगदीश की, अंतन आवे पार ॥"
उसी को परम धाम कहते हैं । उसी के प्रकाश से सूर्य चन्द्रादि सब प्रकाशित होते हैं ।
(क्रमशः)

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