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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*२९. ज्ञानी को अंग*
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*ज्ञानी अरु अज्ञानी की क्रिया सब एकसी ही,*
*अज्ञ आसा और ज्ञानी आस न निरास है ।*
*अज्ञ जोई जोई करै अहंकार बुद्धि धरै,*
*ज्ञानी अहंकार बिनु करत उदास है ॥*
*अज्ञ सुख दुख दोऊ आपु विषै मांनि लेत,*
*ज्ञानी सुख दुख कौ न जानै मेरे पास है ।*
*अज्ञ कौं जगत यह सकल संताप करै,*
*सुन्दर ज्ञानी कै सब ब्रह्म कौ बिलास है ॥२२॥*
*ज्ञानी एवं अज्ञानी का क्रिया भेद* : ज्ञानी एवं अज्ञानी- दोनों की व्यवहारिक क्रियाएँ ऊपर से देखने में समान लगती है, तो भी उन दोनों की क्रियाओं में यही अन्तर है कि अज्ञानी की सभी क्रियाओं में आशा(वासना) साथ लगी रहती है; परन्तु ज्ञानी की किसी भी क्रिया में न आशा है, न निराशा (‘गुणा गुणेषु वर्तन्ते’ इति मत्वा न सज्जते-गीता)
अज्ञानी जो कुछ भी क्रिया करता है, अहंकारबुद्धि(‘मैं कर रहा हूँ’-इस बुद्धि) से करता है; परन्तु ज्ञानी उसी क्रिया को अहंकारबुद्धि का त्याग कर निरपेक्ष भाव से करता है ।
अज्ञानी कोई भी क्रिया करते हुए उससे उतपन्न सुख दुःखों को अपना मान लेता है; परन्तु ज्ञानी उस क्रिया से उत्पन्न सुखदुःखों में निरपेक्ष रहता है । उनमें ममत्त्वबुद्धि नहीं रखता ।
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - अतः अज्ञानी के लिये सभी क्रियाएँ संतापदायक(दुःख देने वाली होती है, परन्तु ज्ञानी उन सभी क्रियाओं से प्राप्त होने वाले सुख दुःख को केवल ब्रह्मविलास(प्रभुलीला) मानता है ॥२२॥
(क्रमशः)

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