शनिवार, 26 सितंबर 2015

*= राजान्न का त्याग =*

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-१)"*
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= २२ वां विन्दु चतुर्थदिन =*
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*= राजान्न का त्याग =*
दादूजी को सत्कार पूर्वक अपने महल में ले जाकर सब प्रकार सजा हुआ सुन्दर महल दिखाया और पूछा - भगवन् ! महल कैसा है ? दादूजी ने कहा - सब मिथ्या मायिक रचना है, सबको माया ने अपने अधीन कर रखा है । सब उसकी परतंत्रता में ही सुख मान रहे हैं ।
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फिर राजा ने स्वामीजी को भोजन करने के स्थान में ले जाकर भोजन करने के आसन पर बैठाया और भोजन के पूर्व की सब व्यवस्था हो जाने पर भोजन का थाल स्वामीजी के सामने चौकी पर लाकर धर दिया तथा प्रार्थना की, भगवन् ! भोजन कीजिये ।
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किंतु स्वामीजी ने भोजन की ओर दृष्टि भी नहीं की । तब राजा ने कहा - भगवन् ! भोजन कीजिये, नाराज कैसे हो रहे हैं ? दादूजी ने कहा - नाराज तो किससे होंगे जिस से सबकी उत्पत्ति हुई है, वही एक अद्वैत सब में व्यापक है -
"किस से वैरी हो रहा, दूजा कोई नाहिं ।
जिसके अगतैं ऊपजे, सोई है सब माहिं ॥"
तो भी हमारा अधिकार नहीं है कि ऐसे षट् रस युक्त राजसी भोजन हम करें । जो ऐसे षट् रस युक्त भोजन करने में मन लगाया जायगा तो ईश्वर का नाम का निरंतर स्मरण होना कठिन है ।
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"खाटा मीठा खायकर, स्वाद चित दिया ।
इनमे जीव विलंविया, हरि नाम न लिया ॥"
राजा के और राजस अन्न के खाने से साधक के साधन में विघ्न हो जाता है । ऐसी सेवा जिस संत को लोक वासना हो उस संत की करो । हम तो निवृत्ति प्रधान और निरंजन राम का चिन्तन करने वाले हैं, हमें राजस तथा राजान्न प्रिय नहीं लगता है । हम तो जो संत नगर से भिक्षा लायेंगे, उसी को पायेंगे । इसलिये हमको तो जाने दो और यह भोजन किसी अन्य को ही जिमा दो । इसमें हमारा कोई रोष नहीं है, तुम नाराज नहीं होना ।
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हमने तुम्हारा निमंत्रण तो माना ही नहीं था, तुमने तो यह भोजन हम से छिपा कर बनवाया है । ऐसा कह कर दादूजी खड़े हो गये । तब राजा ने चरणों में प्रणाम करके कहा - स्वामिन् ! आपको मैंने बहुत परिश्रम दिया है किंतु क्या करता बादशाह के हुक्म से मुझे ऐसा करना ही पड़ा है । दादूजी ने कहा - हमें कोई परिश्रम नहीं हुआ है, हम तो सुख दुःख में सम रहकर विचरते हैं । ऐसा कह कर दादूजी शनैः शनैः २ बाग में पधार गये ।
(क्रमशः)

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