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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*२९. ज्ञानी को अंग*
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*कामी है न जती है न सूम है न सती है न,
*राजा है न रंक है न तन है न मन है ।
*सोवै है न जागै है न पीछै है न आगै है न,
*ग्रहै न त्याग है न घर है न वन है ॥
*थिर है न डोलै है न मौन है न बोलै है न,
*बंधै है न खोलै है न स्वामी है न जन है ।
*वैसो कोऊ होई जब वाकी गति जानै तब,
*सुन्दर कहत ज्ञांनी शुद्ध ज्ञान - घन है ॥१८॥
*ज्ञानी ब्रह्मरूप* : ज्ञानावस्था में पहुँचने पर ज्ञानी न कामभोगी रह जाता है, न यति । न कंजूस, न दानी । न राजा, न निर्धन । तब उसकी न अपने तन के प्रति न मन के प्रति ही कोई आस्था रह जाती है ।
उसकी उस अवस्था को सुप्तावस्था कहा जा सकता है, न जाग्रदवस्था । न उसका अन्त ज्ञात होता है, न आदि । न उस की किसी परिग्रह में रुचि रह जाती है, न त्याग में । तब उसके लिये न घर का महत्त्व रह जाता है, न वन का ।
उस अवस्था में न वह स्थिर कहला सकता है, न चञ्चल; न मौन, न बद्ध; न मुक्त एवं न स्वामी(मालिक) न परिचारक ।
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - ऐसी अवस्था में पहुँचने पर,साधक को ‘ज्ञानी’ कहा जाता है । ऐसा ज्ञानी ज्ञानधन( = ज्ञान से परिपूर्ण,परब्रह्म) रूप हो जाता है ॥१८॥
(क्रमशः)

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