सोमवार, 21 सितंबर 2015

*= राजान्न से विघ्न =*

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-१)"*
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= २१ वां विन्दु सीकरी सत्संग दिन ३ =*
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*= राजान्न से विघ्न =*
उस अफसर ने जाकर बादशाह को कहा - हुजुर ! बड़ी आफत आ गई है, जिसका वर्णन भी मुझ से नहीं होता । अकबर बादशाह ने पूछा - क्या आफत है कहो - मेरे सामने कहने से तुमको किसका भय है ?
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उसने कहा - हुजुर ! इन दादू आदि साधुओं को छेड़ने से तो अपनी भलाई नहीं दिखाई देती है । जो साधू भिक्षा लेकर आया था, उसने द्वार बन्द देखकर कुछ आवाजें दी । फिर द्वारपाल नहीं बोला तो अपने शरीर को वामन अवतार के समान बढ़ाकर किले की दीवार लांघकर चला गया । यह देख द्वारपाल के प्राण भय के मारे काँपने लगे ।
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यह सुनकर अकबर भी हैरान हो गया और बोला - इन साधुओं से डरना ही चाहिये । जैसे वे लोग प्रसन्न रहें वैसा ही करना चाहिये । हमारा बल इनके आगे नहीं चल सकेगा । यदि ये रुष्ट होकर शाप दे देंगे तो आफत आ जायगी । जिनके चेले ही ऐसे ऐसे हैं, तब उनके गुरुओं की तो क्या कहें ? क्या पता कितनी शक्तिवाले हैं । देखो ! पहले एक चेले से पींजरे में सिंह डर गया था और दूसरा कितनी ऊंची दीवार को भी लांघ गया ।
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उक्त सब कहकर बादशाह ने कहा - ये सन्त तो परमात्मा के प्यारे हैं, अब आगे इनसे कुछ भी नहीं कहना, जैसे ये प्रसन्न रहें ऐसा ही व्यवहार करना और विशेष रूप से प्रेम ही करना; ये संत तो ईश्वर स्वरूप ही हैं । फिर पास बैठे हुये बीरबल ने भी कहा - तुम मेरी यह बात भी मन में धारण करलो - जैसे भी हो वैसे ही उनके मन को प्रसन्न रखने का ध्यान रखना ।
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संतों के आशीर्वाद से सब प्रकार का सुख प्राप्त होता है और उनको दुःख देने से नरक मिलता है । अब उन संतों के मन को पहचान कर उन्हें मस्तक नमाना जिससे वे शुभाशीर्वाद दे सकें । हम लोगों ने यह महान् निधि प्राप्त की है । ऐसे संत न तो पहले यहां कोई आये हैं और आगे आने की भी आशा नहीं । अतः अवसर पर उन संतों से जितना लाभ उठालें उतना ही हमारा भला है ।
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बादशाह तथा बीरबल की बात सुनकर तथा स्वीकार करके वह द्वारपालों का अफसर उन दोनों बादशाह और बीरबल को मस्तक नमा कर अपने स्थान को चला गया । जग्गाजी ने भिक्षा लाकर दादूजी के सामने रखदी । प्रणाम दण्डवत किया फिर गुरु दादूजी की आज्ञा से सब संतों ने भोजन किया ।
(क्रमशः)


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