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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*२९. ज्ञानी को अंग*
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*अज्ञानी कौ दुख कौ समूह जग जानियत,*
*ज्ञानी कौ जगत सब आनन्द स्वरूप है ।*
*नैंन हीन कौ तौ घर बाहिर न सूझै कछु,*
*जहां जाइ तहां तहां अंधकूप है ॥*
*जाकै चक्षु है प्रकाश अंधकार भयौ नाश,*
*वाकौ जहां रहै तहां सूरज की धूप है ।*
*सुन्दर अज्ञानी ज्ञानी अंतरि बहुत आहि,*
*वाकै सदा राति वाकै दिवस अनूप है ॥२१॥*
*अज्ञानी एवं ज्ञानी का दृष्टिभेद* : यह समस्त संसार अज्ञानी को दुःखमय प्रतीत होता है, परन्तु ज्ञानी को वही संसार, अज्ञान का आवरण हट जाने से, सुखमय प्रतीत होता है ।
जैसे किसी नेत्रहीन अन्धे को घर में या बाहर कुछ भी नहीं दिखायी देता; वह जहाँ भी जाता है उसे घनघोर अन्धकार ही दिखायी देता है ।
परन्तु जिस के पास नेत्रज्योति है, वह अन्धकार विनष्ट हुआ रहता है । उसे अपने ज्ञान के कारण, सर्वत्र ऐसा लगता है जैसे सूर्य का विमल प्रकाश हो ।
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - मेरी दृष्टि में अज्ञानी एवं ज्ञानी में यही सबसे बड़ा अन्तर(भेद) है कि अज्ञानी जिस को रात्रि(अन्धकारमय) समझता है, ज्ञानी उसी को दिन का प्रकाश मानता है१॥२१॥
(१तु०- “या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागति संयमी।”
-भ०गी०, द्वि० अ, श्लो ० ६१)
(क्रमशः)

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