॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
"श्री दादू अनुभव वाणी" टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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= स्मरण का अँग २ =
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दादू नीका नाम है, सो तू हिरदै राखि ।
पाखँड प्रपँच दूर कर, सुन साधू जन की साखि ॥७॥
यज्ञ - योगादि साधनों के साधक को पतन का भय रहता है, नाम - साधना के साधक को नहीं । इसलिए नाम - स्मरण उत्तम साधन है । सँतों की साधन विषयक साखियें सुनकर उनके विचार द्वारा पाखँड प्रपँच को दूर करके तू वह नाम - स्मरण ही निरन्तर हृदय में रख ।
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दादू नीका नाम है, आप कहै समझाइ ।
और आरँभ सब छाड़ि दे, राम नाम ल्यौ लाइ ॥८॥
स्वयँ भगवान् भी बारँबार अपने भक्तों को समझा - समझा कर कहते रहते हैं कि - "मेरे नाम चिन्तन द्वारा मेरे परायण रहने वाला भक्त ही मुझे प्रिय होता है ।" इस भगवद् वचन से भी नाम - स्मरण परम श्रेष्ठ साधन सिद्ध होता है । इसलिए जन्म - मरण रूप चक्र में फिराने वाले निषिद्ध कर्म, सकाम शुभकर्म आदि अन्य सभी आरँभों को त्याग कर राम नाम - स्मरण में ही अखँड वृत्ति लगा ।
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राम भजन का सोच क्या, करताँ होइ सो होइ ।
दादू राम संभालिये, फिर बूझिये न कोइ ॥९॥
राम भजन के फल का, क्या विचार करना है ? भजन करने से जो होता है वही होगा अर्थात् राम ही प्राप्त होगा । राम भजन द्वारा सब सँसार में राम को ही देख, सब को राम रूप देखने का अभ्यास हो जाने पर फिर कोई भी प्रश्न पूछने की आवश्यकता नहीं रह जाती है ।
(क्रमशः)

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