गुरुवार, 31 मार्च 2016

= विन्दु (२)७३ =

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज,
पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= अथ विन्दु ७३ =*
*= टौंक संत संमेलन में दादूजी के अनन्त शरीर =*
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भोजन राशि अटूट होने का चमत्कार देखकर संमेलन में आये हुये सभी संप्रदायों के संतों ने दादूजी के कर-कमलों से प्रसाद लेने की इच्छा प्रकट करी और माधवकाणी को कहा कि - दादूजी के हाथों से हम सब को प्रसाद दिलाने की व्यवस्था करो, कारण, संत दादूजी तो साक्षात् ब्रह्मरूप ही हैं । कहा भी है
"परसादी मांगे सब भेखा, दादू ब्रह्मरूप कर देखा"
(जनगोपाल.)
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किंतु यह शंका स्वाभाविक होती है कि कुछ वैष्णव तो स्वयं पाकी होते हैं, वे किसी अन्य का हाथ लगने पर खाते ही नहीं हैं, उन्होंने दादूजी के हाथ का प्रसाद लेने की इच्छा क्यों करी होगी, इस पर भी कहा है -
"गुरु दयाकर छाया गेरी, मिटी चरम दृष्टि सब केरी "
(जनगोपाल.)
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माधवकाणी ने दादूजी के पास जाकर कहा - स्वामिन् ! यहां आये हुये सभी संप्रादायों के संत आप के कर-कमलों से प्रसाद लेने का आग्रह कर रहे हैं किंतु आप कैसे दे सकेंगे ? प्रसाद बांटने की स्थिति ऐसी होती है कि लोग बांटने वाले को चारों ओर से घेर लेते हैं । इस लिये मेरे विचार से तो आपको प्रसाद बांटने से कष्ट होगा ।
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तब दादूजी ने कहा - यदि सब संत चाहते हैं तब तो मुझे कोई कष्ट नहीं होगा । और प्रसाद बांट दिया जायगा । फिर माधवकाणी ने कहा - प्रसाद किस वस्तु का बांटा जाय ? दादूजी ने कहा चार मूठी लौंग ले आओ वे सब के लिये बहुत हैं ।
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माधवकाणी ने सब संतों को सूचित कर दिया कि दादूजी महाराज अपने कर-कमलों से प्रसाद सत्संग समाप्ति पर बांटेंगे, उस समय सब उपस्थित हो जायें उसके पश्चात् वे नहीं देंगे । फिर दादूजी की आज्ञानुसार चार मूठी लौंग दादूजी महाराज के पास लाकर रखदीं ।
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फिर सत्संग समाप्ति पर दादूजी प्रसाद बांट ने को खड़े हुये तब सब भेषधारी प्रसाद के लिये एक साथ ही झुकने लगे यह देखकर माधवकाणी उच्च स्वर से कहने लगे - आप लोग एक दूसरे को दबाते हुये झुकें नहीं, प्रसाद सब को मिलेगा, अधिक झुकने से वृद्ध संत नीचे दब जायेंगे ।
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उस समय टीलाजी ने भी दादूजी महाराज को कहा - गुरुदेव सभी भेष धारी प्रसाद के लिये आग्रह पूर्वक आगे बढ़ रहे हैं । इतने में ही दादूजी ने अपनी योग-शक्ति से अपने अनन्त शरीर बनाकर उसी क्षण में सब के हाथों में अपने हाथों द्वारा लौंग प्रसाद सब को दे दिया । उस समय बड़े-बड़े महन्त, आचार्य और परम-प्रवीण विद्वान संतों ने भी हठकर के प्रसाद लिया था । प्रसाद लेकर सब शाँतभाव से हट गये ।
(क्रमशः)

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