रविवार, 27 मार्च 2016

= १८१ =

卐 सत्यराम सा 卐
सो तत सहजैं सुषमन कहणा,
साँच पकड़ मन जुग जुग रहणा ॥ टेक ॥
प्रेम प्रीति कर नीका राखै, बारम्बार सहज नर भाषै ॥ १ ॥
मुख हिरदै सो सहज संभारै, तिहि तत रहणा कदे न विसारै ॥ २ ॥
अन्तर सोई नीका जाणै, निमिष न बिसरै ब्रह्म बखाणै ॥ ३ ॥
सोई सुजाण सुधा रस पीवै, दादू देखि जुग जुग जीवै ॥ ४ ॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव इसमें स्मरण का उपदेश करते हैं कि हे हमारे मन ! उस परमात्मा रूपी तत्व का नाम स्मरण कर और उसी को वाणी द्वारा मुमुक्षुओं को स्मरण का आदेश दे, क्योंकि वह सत्य स्वरूप है, उसकी शरण ग्रहण कर, तो तूँ जुग - जुग में उसके स्वरूप में ही स्थिर रहेगा । परन्तु प्रीति के सहित प्रेमा भक्ति द्वारा उसके नाम स्मरण को अच्छी प्रकार हृदय में रखना और पुन - पुनः उसी का उपदेश करना । मुख से और हृदय में स्वभाव से ही उसको हर समय याद रख, तो फिर उसी तत्व स्वरूप में तूँ रहेगा । उसको कभी भी जागृत स्वप्न में नहीं भूलना । हृदय में वही चेतन स्वरूप निवास करता है, उसको विचारपूर्वक जाने, एक क्षण भी उसको नहीं भूले । इस प्रकार उस ब्रह्म - तत्व का अन्तर - वृत्ति द्वारा विचार करना और जिज्ञासुओं के सामने उसी का बखान करना अर्थात् वर्णन करना । ऐसा विवेकी साधक ही ‘सुजाण’, कहिए चतुर है, जो उपरोक्त प्रकार से ब्रह्म अमृत - रस का पान करता है । मुक्त पुरुष कहते हैं कि ऐसा विवेकी पुरुष ही जुग - जुग में सजीवन भाव को प्राप्त होता है ।
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साभार ~ Manoj Puri Goswami
~झीनी झीनी बीनी चदरिया~

झीनी झीनी बीनी चदरिया॥
काहे कै ताना काहे कै भरनी कौन तार से बीनी चदरिया।
इंगला पिंगला ताना भरनी सुषमन तार से बीनी चदरिया॥
आठ कंवल दल चरखा डोले, पाँच तत्त गुन तीनी चदरिया।
साईं को सियत मास दस लागे ठोक ठोक के बीनी चदरिया॥
सो चादर सुर नर मुनि ओढ़े, ओढ़ के मैली कीनी चदरिया।
दास कबीर जतन से ओढ़ी ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया

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