सोमवार, 28 मार्च 2016

= समरण का अंग =(२/१-३)

॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
"श्री दादू अनुभव वाणी" टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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= स्मरण का अँग २ =
गुरु से प्राप्त नाम के स्मरण विषयक विचार करने को स्मरण अँग कहने में प्रवृत्त हुये प्रथम मँगल कर रहे हैं - 
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दादू नमो नमो निरंजनँ, नमस्कार गुरुदेवत: । 
वन्दनँ सर्व साधवा, प्रणामँ पारँगत: ॥१॥ 
जिनकी कृपा से साधक स्मरण साधना के विघ्नों से पार होकर स्मरण द्वारा परब्रह्म को प्राप्त होता है उन निरंजन राम, सद्गुरु और सब सँतों को हम अनेक प्रणाम करते हैं । 
एकै अक्षर पीव का, सोई सत कर जाणि । 
राम नाम सद्गुरु कह्या, दादू सो परवाणि ॥२॥ 
राम नाम स्मरण - साधन की प्रामाणिकता बता रहे हैं - सजातीय, विजातीय, स्वगत भेद रहित, अविनाशी प्रभु का राम नाम स्मरण साधन सद्गुरु का कहा हुआ है, अत: उसी को सच्चा साधन जानकर करो । शास्त्र द्वारा भी वही प्रामाणिक सिद्ध होता है । 
पहली श्रवण द्वितीय रसना, तृतीय हिरदै गाइ । 
चतुर्थी चिन्तन भया, तब रोम - रोम ल्यौ लाइ ॥३॥ 
नाम स्मरण - साधन की पद्धति बता रहे हैं - नाम माहात्म्य सुनना, नाम - स्मरण साधना की प्रथमावस्था है । माहात्म्य सुनकर साधक साधारण जप में प्रवृत्त होता है । दूसरे को न सुनाई दे, ऐसे जिव्हा से जपना दूसरी अवस्था है । इसे ही उपाँशु जाप कहते हैं । हृदय में चिन्तन करना तृतीयावस्था है, यही मानस जप कहलाता है । नाम में अखँड वृत्ति लगाने पर जब रोम - रोम से चिन्तन होने लगता है तब वह चतुर्थावस्था कहलाती है । इसमें दश इन्द्रियें और चतुष्टय अन्त:करण ये चौदह सब प्रकार भगवत् परायण हो जाते हैं । इस चौथी अवस्था का अन्तिम परिणाम जीव ब्रह्म की एकता ही होता है । इस प्रकार नाम - स्मरण साधना द्वारा सँतों ने परब्रह्म को प्राप्त किया है । (चतुर्थी के स्थान में चतुर्दशी पाठ भी है ।) 
(क्रमशः)

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