卐 सत्यराम सा 卐
दादू जब लग मूल न सींचिये, तब लग हरा न होइ ।
सेवा निष्फल सब गई, फिर पछताना सोइ ॥
दादू सींचे मूल के, सब सींच्या विस्तार ।
दादू सींचे मूल बिन, बाद गई बेगार ॥
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साभार ~ Vishwajeet Singh Anant
माओत्से-तुंग ने अपने बचपन की एक छोटी सी घटना लिखी है। लिखा है कि मेरी मां का एक बगीचा था। उस बगीचे में ऐसे सुंदर फूल खिलते थे कि दूर-दूर से लोग उन्हें देखने आते थे। एक बार मेरी बूढ़ी बिमार पड़ गयी। वह बहुत चिंतित थी- अपनी बीमारी के लिये नहीं, बगीचे में खिले फूलों के लिये-कि बगीचे में खिले फूल कुम्हला न जाएं। वह इतनी बीमार थी कि बिस्तर से बाहर नहीं निकल सकती थी।
मैंने मां से कहा, तुम घबड़ाओ मत, मैं देखभाल कर लूंगा फूलों की। और मैंने पंद्रह दिन तक फूलों की बहुत देखभाल की। एक-एक पत्ते की धूल झाड़ी, एक-एक पत्ते को पोंछा और साफ किया। एक–एक पत्ते को संभाला, एक-एक फूल की देखभाल की, लेकिन न मालूम क्यों फूल मुरझाते गये, पत्ते सूखते गये और सारा बगीचा सूखता गया! पंद्रह दिन बाद बूढ़ी मां बाहर आयी और बाहर आकर उसने देखा कि उसकी सारी बगिया उजड़ गयी है। बेहोश होकर गिर पड़े हैं, फूल कुम्हला गये हैं, कलियां-कलियां ही रह गयी हैं, फूल नहीं बनी हैं। मां पूछने लगी, 'तू क्या करता था पंद्रह दिन तक? सुबह से रात तक सोता भी नहीं था! यह क्या हुआ?'
मेरी आंखों में आंसू आ गये। मैंने कहा, 'मैंने बहुत देखभाल की। मैंने एक-एक पत्ते की धूल झाड़ी। मैंने एक-एक फूल पर पानी छिड़का। मैंने एक-एक पौधे को गले लगाकर प्रेम किया, लेकिन न- मालूम कैसे पागल पौधे हैं, सब कुम्हला गये हैं, सब सूख गये हैं।' यूं तो मां की आंखों में बगिया को देखकर आंसू थे, लेकिन मेरी हालत देखकर वह हंसने लगी और उसने कहा, 'पागल, फूलों के प्राण फूलों में नहीं होते, उनकी जड़ों में होते हैं, जो दिखाई नहीं पड़ती हैं और जमींन के नीचे होती हैं। पानी फूलों को नहीं देना पड़ता है, जड़ों को देना पडता है। फिक्र पत्तों की नहीं करनी पड़ती ? जड़ो की करनी पड़ती है। पत्तों की लाख देखभाल करें तो भी जड़े कुम्हला जायेंगी और पत्ते भी सूख जायेंगे। और जड़ों की थोड़ी सी देखभाल करें और पत्तों की, फूलों की कोई भी देखभाल न करें, तो भी पत्ते फलते रहेंगे, फूल खिलते रहेंगे। सुगंध उड़ती रहेगी।' मैंने पूछा, 'लेकिन जड़ कहां है ? वह तो दिखायी नहीं पड़ती है!'
…… हम सब भी यही पूछते हैं-
जीवन कहां है ? वह तो दिखायी नहीं पड़ता है। वह बाहर नहीं छिपा है, वह अपने ही भीतर है- अपनी ही जड़ों में। बाहर जहां दिखाई पड़ता है सब कुछ, वहां पत्ते हैं, शाखाएं हैं। भीतर जहां दिखाई नहीं पडता, वहां जड़ें हैं।

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