शनिवार, 26 मार्च 2016

= ज्ञानसमुद्र(तृ. उ. ५५-७) =

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स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - श्रीसुन्दर ग्रंथावली 
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान, 
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*= ज्ञानसमुद्र ग्रन्थ ~ तृतीय उल्लास =*
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*अब आज्ञा चक्र सु भ्रुव मंझार ।* 
*लषि द्वै दल द्वै अक्षर बिचार ।* 
*तहँ हं क्षं वर्ण सु अति अनूप ।* 
*यह षष्ठ सु चक्र कह्यो स्वरुप ॥५५॥*
अब *छठा आज्ञा चक्र* के विषय में सुनो । दोनों भ्रुवों(भौं) के मध्य में इसका स्थान है । इसके दो दल तथा दो ही अक्षर समझने चाहिये । वे अत्यन्त अनुपम दो वर्ण हैं- हं तथा क्षं । यह छठे चक्र का स्वरुप कह दिया ॥५५॥ 
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*जब इनि षट्चक्र १ हि भेदि जाइ ।* 
*तब उहै सुसुमना सुख समाइ ।* 
*ताही तैं प्राणायाम सार ।* 
*सुनि शिष्य कहौं ताकौं बिचार ॥५६॥*
(१- इन छहों चक्रों का वर्णन ‘गोरक्षपद्धति’ के प्रथम शत्तक के १३-१४ श्‍लोक तक है । तथा ‘योगचिंतामणि’ ग्रन्थ में भी है । )
(चक्र भेदन की उपयोगिता बतलाते हैं-) जब योगी इन छह चक्रों को भेदन कर लेता है तब वह सुषुमना मार्ग में समाधिसुख को प्राप्त कर पाता है । अत: हे शिष्य ! प्रणायाम विधि में षट्चक्रों की यही उपयोगिता है । अब मैं योगक्रिया में अत्यन्त आवश्यक प्राणायाम-प्रक्रिया को विधिपूर्वक तुम्हें बताऊँगा ॥५६॥ 
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*अथ प्राणायाम-क्रिया ~ दोहा*
*इडा नाडि पूरक करै, कुंभक राखै माहिं ।* 
*रेचक करिये पिंगला, सब पातक कटि जांहिं ॥५७॥*
(अब प्राणायामविधि बता रहे हैं-) इडा(चन्द्र) नाड़ी से पूरक करना चाहिये । अर्थात बायें नाक से स्वास भरना चाहिये । सुषुम्णा(अग्नि) नाड़ी से कुम्भक करना चाहिये । अर्थात श्‍वास को रोके रखना चाहिये । और पिंगला(सूर्य) नाड़ी से रेचक करना चाहिये । अथार्त दाहिने नथुने से स्वास को धीरे-धीरे निकालना चाहिये । इस तरह अभ्यास करते-करते योगी के सब पाप(रोग-दोष) कट जाते हैं ॥५७॥
(क्रमशः)

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