शनिवार, 26 मार्च 2016

= १७८ =

卐 सत्यराम सा 卐
तो को केता कह्या मन मेरे ।
क्षण इक मांही जाइ अनेरे, प्राण उधारी ले रे ॥ टेक ॥
आगे है मन खरी विमासणि, लेखा मांगै दे रे ।
काहे सोवे नींद भरी रे, कृत विचारे तेरे ॥ १ ॥
ते परि कीजे मन विचारे, राखै चरणहु नेरे ।
रती इक जीवन मोहि न सूझै, दादू चेत सवेरे ॥ २ ॥
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साभार ~ Manoj Puri Goswami
मन का गुलाम न बनों, मित्र बनों-

गीता ..6.24- 6.36 तक
यहाँ श्री कृष्ण और अर्जुन के माध्यम से जो बात हमें मिलती है उस की समझ ही योग है । मन से मित्रता कैसे स्थापित की जा सकती है ? इस बात को समझनें के लिए आप देखिये और समझिये गीता की निम्न बातों को -------


[क] इंदियों के स्वभाव को जानों [ गीता - 15.9 ]
[ख] बिषयोंके सम्मोहन को समझो [गीता - 3.34 ]
[ग] इन्द्रिय - मन सम्बन्ध को समझो [ गीता - 2.60 , 2.67 ]
[घ] इन्द्रिय- बिषय के योग से जो कर्म होता है, वह भोग है [गीता - 5.22 ]
[च] भोग कर्म के सुख में दुःख का बीज होता है [गीता - 2.14 , 5.22 , 18.38 ]
[छ] कर्म इन्द्रियों को हठात बश में करनें का प्रयाश, अहंकार को सघन करता है [गीता - 3.6 ]
[ज] इंदियों को बिषयों से दूर करनें से क्या होगा ? मन तो उन-उन बिषयों पर मनन करता ही रहेगा [ गीता -2.59 ]
[झ] इन्द्रियों को मन से बश में करो [गीता - 3.7 ]


अर्जुन का प्रश्न है ----हे प्रभु ! मैं मन को कैसे बश में करू ?---गीता ....6.34 - 6.35
परम श्री कृष्ण कहते हैं ----
यह काम अभ्यास एवं बैराग्य से संभव है -- बड़ा सा प्रश्न और उसका छोटा सा जबाब । अब आप जबाब को समझ लें ------
तन से बैरागी की तरह कोई अपनें को बना सकता है लेकिन .......
मन से बैरागी दुर्लभ हैं । बैराग्य अभ्यास का परिणाम है । कोई बैरागी बन नहीं सकता, बैराग्य स्वतः घटित होता है ।
====ॐ======

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