॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
"श्री दादू अनुभव वाणी" टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
= गुरुदेव का अँग १ =
दादू सब ही गुरु किये, पशु पँखी बन राइ ।
तीन लोक गुण पँच सौं, सब ही माँहि खुदाइ ॥१५६ ॥
पशु, पक्षी, वन पँक्ति आदि सभी उस महान् ईश्वर के रचे हुये हैं । तीन गुण और पँच भूतों से आदि सभी में ईश्वर निमित्त कारण चेतन तथा उपादान कारण माया रूप से विद्यमान है और कारण ब्रह्म ही उपास्य है, कार्य नहीं । अत: उक्त २४ मँत्रों द्वारा बताई हुई पद्धति के कारण ब्रह्म के लख्यार्थ शुद्ध ब्रह्म की ही उपासना करनी चाहिए ।
जो पहली सद्गुरु कह्या, सो नैनहुं देख्या आइ ।
अरस परस मिल एक रस, दादू रहे समाइ ॥ १५७ ॥
इति श्री गुरुदेव का अँग समाप्त ॥ १ ॥ सा - १५७ ।
जो सद्गुरु की प्राप्ति के समय परब्रह्म का स्वरूप अपने उपदेश द्वारा सद्गुरु ने बताया था, वही स्वरूप साधन द्वारा समाधि में आकर हमने अपने ज्ञान नेत्रों से अभेद रूप से देखा है और अब आपस में अन्तराय रहित एक रस मिल कर उसी में समा रहे हैं ।
इति श्री दादू गिरार्थ प्रकाशिका श्री गुरुदेव का अँग समाप्त: ॥ १ ॥
(क्रमशः)

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