बुधवार, 30 मार्च 2016

= ज्ञानसमुद्र(तृ. उ. ६३-४) =


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स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - श्रीसुन्दर ग्रंथावली 
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान, 
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*= ज्ञानसमुद्र ग्रन्थ ~ तृतीय उल्लास =*
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*अधमे द्वादश मात्रा उक्तं ।* 
*मध्यम मात्रा द्विगुणा युक्तं ।* 
*उत्तम मात्रा त्रिगुणा कहिये ।* 
*प्रणायाम सु निर्णय लहिये१ ॥६३॥*
{१- ‘प्रथमे द्वादशी मात्रा मध्यमे द्विगुणा मता । 
उत्तमे त्रिगुणा प्रोक्ता प्राणायामस्य निर्णय:’ (गोरक्ष पद्धति, २.श०, ५.श्‍लो,) पूरक में १२, कुम्भक में १६, रेचक में१०, यह कनिष्ट । और इसकी द्विगुणी २४, ३२, २० । मध्यम । और तिगुणी ३६, ४८, ३० उत्तम ।}
यह १२ मात्रा की विधि(१२, १६, १०) साधारण(कनिष्ठ) कहलाती है । यदि योगी इसी विधि को(अभ्यासपूर्वक) द्विगुणित कर दे(अर्थात्२४, ३२, २० कर दे) तो यह मध्यम विधि कहलाती है । और उसे यदि धीरे धीरे त्रिगुणित (३६, ४८, ३०) कर दे तो यह उत्तम है । इस तरह प्राणायाम विधि के उत्तम, मध्यम, और कनिष्ठ भेद जानने चाहिये ॥६३॥ (यह श्रीगोरखनाथजी का मत हुआ) । 
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*सोरठा*
*कुम्भक२ अष्ट सु विद्धि, दश ही प्रकार की ।* 
*बंध तीन तिनि मद्धि, उत्तम साधन योग के ॥६४॥*
(२- आठ प्रकार के कुम्भक के भेद, ‘हठयोगप्रदीपिका’ ग्रन्थ के उपदेश २ श्‍लो० ४४ से ७८ तक है ।)
योग के उत्तम साधनों में, योगी को आठ प्रकार के कुम्भक, दस प्रकार की मुद्राओं तथा उन्हीं के अन्तर्गत तीन बन्धों का ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है ॥६४॥
(क्रमशः)

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