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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज,
पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ७२ =*
*= सत्संग संकीर्तन =*
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भगवद् विश्वास पूर्वक भजन करने की प्रेरणा करते हैं - हे पागल ! सत्य स्वरूप प्रभु का भजन मत छोड़, वे पूर्ण प्रभु सबकी इच्छा पूर्ण करने वाले हैं । उन्होंने तुझे उत्पन्न किया है, इससे उनको तेरे भरण-पोषण की सारी चिन्ता है और वे तुझे देने में सदा वीर रहते हैं ।
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गर्भवास में जिन्होंने जठराग्नि के पास रहने पर भी उसकी तप्त से तुझे अलग रख कर युक्ति पूर्वक शीतलता सिंचन करते हुये माता के खान-पानादि से प्राणों का आधार भोजन दिया था देख, क्रौंच पक्षी कहां अण्डा धरता है और कहां संचार करता है, वहां हिमालय में प्रभु को छोड़ कर उसका रक्षक कौन है ? हिम नष्ट करता है, वहां भी जो प्रभु क्रौंच के अण्डों की रक्षा करते आ रहे हैं, वे ही हमारे स्वामी हैं ।
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जल, स्थल और नभ में जितने भी जीव हैं, उन सबका भरण-पोषण करते हैं । अरे ! तू नर होकर भी क्यों दुःखी१ हो रहा है ? वे प्रभु तो शिला के बीच, जहां पहुँचाने का कोई मार्ग भी नहीं होता है, वहां भी शक्कर खाने वाले कीट को शक्कर पहुंचा देते हैं । जिन प्रभु ने यह सृष्टि रचना का भार अपने ऊपर लिया है, वे ही निर्वाह भी करेंगे । उन प्रभु को एक क्षण भी मत भूल, इसी से तेरा जीवन सार्थक होगा ।
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इस पद को सुनाकर माधवकाणी का धैर्य बढ़ाया । फिर बोले - "आपने जो-जो भोजन सामग्री बनाई है, उसमें से थोड़ी-थोड़ी सब एक ही थाल में यथा स्थान रखकर ऊपर एक शुद्ध श्वेत वस्त्र से ढंककर यहां ले आओ ।" माधव काणी - जो आज्ञा कहकर भंडार में गये और उक्त प्रकार सब वस्तुयें थाल में सजा कर दादूजी के पास ले आये ।
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फिर दादूजी ने प्रभु से प्रार्थना करके कि - आप अपने भक्त माधव की लज्जा अवश्य रखिये । भक्तों के लिये तो आप ही कल्पवृक्ष हैं । ऐसी प्रार्थना करके दादूजी ने परिचय भोग लगाया अर्थात् प्रभु के प्रकट होने पर भोग लगाया क्योंकि परिचय भोग का ही महान् माहात्म्य है, जैसे -
"परिचय सेवा आरती, परिचय भोग लगाय ।
दादू उस सु प्रसाद की, महिमा कही न जाय ॥"
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फिर वह प्रभु का भोगरूप प्रसाद माधव काणी को देकर कहा - यह थाल का प्रसाद आप अपने भंडार की भोजन राशि की जो जो वस्तु इसमें है वह वह उसी वस्तु में मिलादें फिर आप अपनी इच्छानुसार जिमायें व बाँटे कुछ भी कमी नहीं आयेगी । कहा भी है -
"परसादी ले गंज(राशि) में राखी,
भयो अटूट सन्त सब साखी ।"
(जनगोपाल)
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अर्थात् दादूजी के द्वारा भोग लगाने के पश्चात् भोग थाल का प्रसाद गंज(भोजन राशि) में मिला देने के पश्चात् वह भोजन ही अटूट हो गया । जो पहले एक दिन के लिये भी बहुत कम प्रतीत हो रहा था, वही फिर उत्सव के सात दिन तक चलता रहा । संत, भक्त तथा गरीब आदि वहाँ आने वालों को खूब खिलाया और बाँटा पर उसमें कुछ भी कमी नहीं आई । कहा भी है -
"परिचय भोग लगाइया, स्वामी समर्थ राम ।
सात दिवस तक जीमिया, साधू सब ही धाम ॥"
इति श्री दादूचरितामृत विन्दु ७२ समाप्तः ।
(क्रमशः)

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