गुरुवार, 31 मार्च 2016

= ज्ञानसमुद्र(तृ. उ. ६५-६) =

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🌷🙏🇮🇳 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🇮🇳🙏🌷
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स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - श्रीसुन्दर ग्रंथावली 
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान, 
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*= ज्ञानसमुद्र ग्रन्थ ~ तृतीय उल्लास =*
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*अथ कुंभक नाम ~ छप्पय* 
*सूरयभेदन१ प्रथम, द्वितीय उज्जाई कहिये ।* 
*शीतकार पुनि त्रितिय, शीतली चतुरथ ग्रहिये ॥*
*पंचम है भस्त्रिका, भ्रामरी षष्ट सु जांनहुँ ।* 
*मूरछना सप्तमं अष्टमं, केवल मांनहुँ ॥*
*ये कुम्भक अष्ट प्रकार के, होइ पवन इम रोधनं ।* 
*तब मुद्राबंध लगाइ यहिं, प्रथम करै घट शोधनं ॥६५॥*
(१- ‘सूर्यभेदनमुज्जायी सीत्कारी सीतली तथा । 
भस्त्रिका भ्रामरी मूर्च्छा ह्नाविनीत्यष्ट कुंभका:’ ॥४४॥ इत्यादि ।)
*(आठ प्रकार के कुम्भक ये हैं-) १. सूर्यभेदन, २. उज्जायी, ३. शीत्कार, ४. शीतली, ५. भस्त्रिका, ६. भ्रामरी, ७. मूर्छना, और ८. केवल(ह्नाविनी) ।* योग ग्रन्थों में इन आठ प्रकार के कुम्भकों का वर्णन हुआ है । इनके साधन(अभ्यास) से प्राणवायु के अवरोध पर योगी का पूर्ण नियन्त्रण हो जाता है । इन कुम्भकों की साधना के बाद योगी को मुद्रा तथा बन्धों का भी अभ्यास करना चाहिये । इससे योगी के शरीर की बाह्याभ्यन्तर शुद्धि होती है । यह शुद्धि चित्तवृतिनिरोध में सहायक होती है ॥६५॥
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*अथ नादवर्णनं ~ दोहा*
*जबहिं अष्ट कुम्भक सधहिं, बाजै अनहद नाद ।* 
*दश प्रकार की धुनि सुनहिं, छूटहि सकल विसाद ॥६६॥*
(अब नाद का वर्णन करते हैं -) जब साधक को पूर्वोक्त अष्ट प्रकार के कुम्भकों का समयक् अभ्यास हो जाता है, तो उसके कानों में शरीरस्थ अनाहत नाद(अनहद नाद=बिना बजाये ही बाजै का शब्द) सुनायी पडने लगता है । यह नाद आठ प्रकार का है । इस नाद के अभ्यास से योगी के सभी चित्त विकार विनष्ट होने की स्थिति में पहुँच जाते हैं और चित्तनिरोध में यह पूर्ण सहायक है ॥६६॥     
(२- ‘‘अनाहतस्य शब्दस्य ध्वनिर्य उपलभ्यते ।
ध्वनेरन्तर्गत ज्ञेयं ग्येयस्यान्तर्गतं मनः । 
मनस्तत्र लयं याति तद्विष्णो: परमं पदम्’’ ॥१००॥ 
-हयोगप्रदीपिका उप० ४)
(क्रमशः)

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