शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016

= विन्दु (२)७३ =

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज,
पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ७३ =*
*= लौंग प्रसाद का रहस्य =*

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पश्चात् टीलाजी ने दादूजी महाराज से पूछा - स्वामिन् आपने एक क्षण भर में इतने समुदाय को प्रसाद किस शक्ति से बांट दिया ? फिर वैष्णवों में तो प्रसाद के विषय में विवाद भी चलता है, महंत, संत, आचार्य दूसरे के हाथ से प्रसाद लेते ही नहीं ।
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तब दादूजी ने कहा - इस समय महन्त, संत, आचार्य आदि की चर्म दृष्टि भगवत् कृपा से मिट गई थी । भेद विचार किसी के भी हृदय में नहीं राहा था । दूसरी बात क्षण भर में कैसे दे दिया ? सो तो -
"लीला राजा राम की, खेलैं सब ही संत ।
आपा पर एके भया, छुटी सबहि भरन्त॥
सुरती रूप शरीर का, पिव के परसे होय ।
दादू तन मन एक रस, सुमिरन कहिये सोय ॥"
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अर्थात् इस राजा राम की संसार रूप लीला में सभी संत आवश्यकता पड़ने पर मेरे समान अनन्त शरीर धारण करना रूप खेल खेलते ही रहते हैं और इन प्रसाद लेने वाले संतों में भी अपने पराये का भेद नहीं रह कर प्रभु कृपा से एकता का भाव आ गया था, इससे इनकी सभी भ्रांतियाँ हट गई थीं ।
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जब तन मन से एक रस स्मरण किया जाता है, उसी को वास्तविक स्मरण कहते हैं । उससे प्रभु का साक्षात्कार होता है और साक्षात्कार होने पर उस संत की इच्छानुसार उसके वृत्ति रूप शरीर हो जाते हैं । मैंने वृत्ति रूप अनेक शरीर
धारण करके ही सब को एक साथ प्रसाद दे दिया है । प्रभु कृपा होने पर ऐसे काम संभव हो जाते हैं ।
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दादूजी महाराज के उक्त वचन सुन कर टीलाजी ने कहा -
"द्वैत भाव दुवधा मिटी, सुखी भये सब संत ।
टौंक महोत्सव कारणे, दादू भये अनन्त ॥ "
(क्रमशः)


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