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स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - श्रीसुन्दर ग्रंथावली
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान,
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*= ज्ञानसमुद्र ग्रन्थ ~ तृतीय उल्लास =*
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*छप्पय*
*प्रथम भ्रमर गुंजार,*
*शंख धुनि दुतिय कहिज्जै ।*
*त्रितिये बजहिं मृदंग,*
*चतुर्थै ताल सुनिज्जै ॥*
*पंचम घंटा नाद,*
*षष्ट वीणा धुनि होई ।*
*सप्तम बज्जहिं भेरि,*
*अष्टमं द्वन्द्वभि दोई ॥*
*अब नवमैं गर्ज्ज समुद्र की,*
*दशम मेघ घोषहि गुनै ।*
*कहि सुन्दर अनहद नाद कौं,*
*दश प्रकार१ योगी सुनै ॥६७॥*
(नाद के भेद -) ये नाद दस प्रकार के हैं, जैसे - पहला भौंरे की गूँज जैसा, दूसरा शंख-ध्वनि जैसा, तीसरा मृदंग-ध्वनि जैसा, चौथा ताल-ध्वनि जैसा, पाँचवा घण्टा-ध्वनि जैसा, छठा वीणा-ध्वनि जैसा, सातवाँ भेरी की ध्वनि जैसा, आठवाँ दुन्दुभि की ध्वनि जैसा, नौवाँ समुद्रगर्जन की तरह, और दसवाँ मेघ की गर्जना जैसा होता है । श्रीसुन्दरदासजी महाराज कहते हैं - योगी कुम्भक के सतत अभ्यास के बाद इन उपर्युक्त दस प्रकार के नादों को सुनता हुआ चित्तस्थैर्य का आनन्द प्राप्त करता है ॥६७॥
(१ - दश प्रकार के अनाहत नाद -
‘आदौ जलधि-जीमूत-भेरी-झर्झंरसम्भवा: ।
मध्ये मर्द्दंल-शंखोत्था घंटा काहलजास्तथा ॥८६॥
अंते तु किंकिणी-वंश-वीणा-भ्रमर नि:स्वना: ।
इति नानाविधा नादा: श्रूयन्ते देहमध्यगा:’ ॥८६॥
हठयोगप्रदीपिका, उप० ४ ।
यह नादानुसन्धान की विधि परमानंद की देने वाली हठयोग में वर्णित है, गुरुगम्य है । जो नादों का क्रम श्रीसुन्दरदासजी ने लिखा है वह विरलोपलब्ध है ॥ ‘त्रिपुरसारसमुच्चय’ ग्रन्थ में - १. भ्रमर, २. बंश(बंसी), ३. घंटा, ४. समुद्रगर्जंन, ५. मेघ गर्जंना यों क्रम दिया है । नाद की चार अवस्था हैं- १. आरंभ, २. घट, ३. परिचय, ४. निष्पत्ति । जैसे सर्वत्र योग साधन में है । नाद मानसिक लय का कारण है ।)
(क्रमशः)

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