॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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= **विरह का अँग ३** =
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दादू चोट बिना तन प्रीति न उपजे, औषधि अंग रहंत ।
जनम लगैं जीव पलक न परसे, बूंटी अमर अनंत ॥१०४॥
जब तक रोग वेदना नहीं होता, तब तक अपने शरीर के पास कोट की जेब में औषधि रहने पर भी उसके खाने की रूचि नहीं होती, वैसे ही जब तक विरह - व्यथा नहीं होती तब तक अमर करने वाली अनन्त परमात्मा रूप बूंटी को जीव जीवन भर प्रयत्न करके एक क्षण भर के लिए भी प्राप्त नहीं कर सकता ।
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दादू चोट न लागी विरह की, पीड़ न उपजी आइ ।
जागै न रोवे धाह दे, सोवत गई बिहाइ ॥१०५॥
जिनके भगवद् - विरह की चोट नहीं लगी एवं उनके हृदय में भगवद् प्राप्ति के लिए व्यथा भी नहीं हुई और वे मोह - निद्रा से जागकर भगवद् - दर्शनार्थ धाड़ मार - मार रोये भी नहीं । ऐसे सांसारिक प्राणियों की आयु अज्ञान - निद्रा में सोते - सोते ही बीत गई ।
(क्रमशः)

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