मंगलवार, 12 जुलाई 2016

= विन्दु (२)८० =

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८० =*
= पीथा को सत्य रास दिखाना =
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परम योगेश्वर दादूजी महाराज ने भगवान् को मौन देखकर यह पद बोला -
"मुख बोल स्वामी तू अन्तर्यामी, तेरा शब्द सुहावे राम जी ॥टेक॥
धेनु चरावन बेनु बजावन, दर्श दिखावन कामिनी ॥१॥
विरह उपावन तप्त बुझावन । अंग लगावन भामिनी ॥२॥
संग खिलावन रास बनावन, गोपी भावन भू धरा ॥३॥
दादू तारन दुरित निवारण, संत सुधारण राम जी ॥४॥
हे स्वामिन् ! आप अन्तर्यामी हैं, मेरे मन की बात जानते हैं । रामजी ! आपका शब्द मुझे प्रिय लगता है, आप अपने मुख से बोलिये । आप ज्ञानेन्द्रिय रूप गोवों को चराते हैं, वाणी रूप वंशी बजाते हैं, दर्शन की कामना युक्त बुद्धि को ज्ञान रूप से दर्शन देते हैं ।
भक्तों की बुद्धि में विरह उत्पन्न करते हैं । उन्हें दर्शन देकर उनकी वियोगाग्नि बुझाते हैं । प्रेमा भक्ति युक्त बुद्धि को अपने स्वरूप में लगाते हैं । सत्तामात्र से पृथ्वी को धारण करते हैं । रामजी ! आप संतों का कार्य सब प्रकार से सुधारते हैं । अतः कृपा कीजिये ।
पद का साधारण अर्थ भगवान् श्रीकृष्ण के नृत्य के साथ-साथ उनके मुख से उच्चारण किये हुये शब्दों को सुनने की प्रार्थना है । और विशेष अर्थ भगवान् श्रीकृष्ण के चरित्र का रूपक देकर निरंजन राम से विनय की है । दादूजी की विचार धारा ने राम, कृष्ण और निरंजन ब्रह्म में कुछ भेद नहीं ज्ञात होता है । जो भेद भासता है वह बुद्धि कृत भेद ही भासता है ।
यह श्रुति में प्रसिद्ध ही है कि - ब्रह्मवेत्ता की दृष्टि में सब विश्व ब्रह्म ही है, विश्व और ब्रह्म में कुछ भी भेद नहीं है । भेद अज्ञानियों की दृष्टि में ही है । इस महारास के समय आकश मंडल में स्थित होकर ब्रह्मा, शिव, इन्द्रादि देवता और नारद मुनि इस महारास को देख रहे थे -
"अज नारद शिव देखन आये, इन्द्रादिक जो देव कहाये । "
(महन्त चेतन देव कृत दादू जीवन चरित्र)
परम संत दादूजी महाराज की प्रार्थना से उक्त प्रकार श्रीकृष्ण भगवान् महारास का दृश्य पीथा को दिखाकर गोपियों सहित अन्तर्धान हो गये । अब वहां न शरद ऋतु की पूर्णिमा की रात्रि है और न यमुना नदी है । वही करड़ाला का पर्वत दिखाई दे रहा है ।
इस अद्भुत रास को देखकर पीथा निर्वाण को वैराग्य हो गया । उसने दादूजी के चरणस्पर्श करके प्रार्थना की - स्वामिन् ! मुझे अपना शिष्य बना लीजिये । तब दादूजी ने कहा - तुम तो घींघोली की घाटी में लूट मार का काम करते हो । भजन तो करोगे नहीं, तब तुम को शिष्य बनाने से क्या लाभ है ? तुम्हारे जैसा शिष्य अपने कल्याण के लिये गुरु का बताया हुआ साधन भी नहीं कर सकता उलटा विपरीत ही काम करता है जिससे गुरु की भी बदनामी होती है ।
तब पीथा ने कहा भगवन् ! अब मैं वैसा कार्य कभी भी नहीं करूंगा । मैं आपके सामने प्रतिज्ञा करता हूँ उसका जीवन भर निर्वाह करूंगा, यह मैं यथार्थ ही कहता हूँ, ऐसा कहकर वह बोला -
"गंग यमुन उलटी बहैं, पच्छिम ऊगे भान ।
पीथा चोरु नहिं करे, गुरु दादू की आन ॥"
अर्थात् गंगा, यमुना आदि हिमालय से चलने वाली नदियाँ सदा समुद्र की ओर जाती हैं किन्तु वे चाहे उलटी हिमालय की ओर जाने लगें तथा सूर्य, चन्द्रमा पूर्व दिशा में उदय होते हैं किन्तु वे भी चाहे पच्छिम दिशा में उदय होने लगें । ऐसा होना असंभव है किंतु हो भी जाये तो भी मैं पीथा निर्वाण तो आप दादूजी की शपथ खाकर कहता हूँ कि आज से आगे कभी भी चोरी, धाड़ा नहीं करूंगा ।
(क्रमशः)

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