॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
**श्री दादू अनुभव वाणी टीका** ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
**= विरह का अँग ३ =**
बिन ही नैनहुँ रोवणा, बिन मुख पीड़ पुकार ।
बिन ही हाथों पीटणा, दादू बारंबार ॥१०९॥
भगवद् - विरही जन यद्यपि वियोगिनी नारी के सामान बाहर से रोते, पुकारते और शिर आदि को अपने हाथों से पीटते तो नहीं दिखाई देते, किन्तु उनके अन्तःकरण में वे क्रियाएं बारंबार होती ही रहती हैं ।
प्रीति न उपजे विरह बिन, प्रेम भक्ति क्यों होइ ।
सब झूठे दादू भाव बिन, कोटि करे जे कोइ ॥११०॥
विरह बिना हृदय में प्रीति प्रकट नहीं होती और जिसमें प्रेम का अँकुर ही नहीं, उससे प्रेमाभक्ति कैसे हो सकती है ? परम प्रेम के बिना यदि कोई भगवद् - दर्शनार्थ कोटि उपाय करे तो भी वे मिथ्या ही हैं, उनसे दर्शन न होगा ।
दादू बातों विरह न ऊपजे, बातों प्रीति न होइ ।
बातों प्रेम न पाइये, जिनि रु पतीजे कोइ ॥१११॥
केवल विरह और प्रीति उत्पन्न होने की बातों से विरह और प्रीति नहीं उत्पन्न होते । प्रेम की बातें करने से ही प्रेम नहीं मिलता । केवल इनकी बातें करने वाले पर ऐसा विश्वास न करना चाहिए कि - यह वास्तव में विरही तथा प्रेमी भक्त है ।
(क्रमशः)

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