गुरुवार, 14 जुलाई 2016

= विन्दु (२)८० =

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८० =*
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विद्याद के नरेश हरिसिंह ने जब सुना कि दादूजी महाराज अपने ग्राम पधारे हैं, तब वे दर्शन करने आये । दादूजी महाराज ने उनके शरीर की अकड़ तथा मरोड़ को देखकर उनको सचेत करने के लिये यह पद कहा -
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*= हरिसिंह को उपदेश =*
नेटि रे माटी मैं मिलना, 
मोड़ मोड़ देह काहे को चलना ॥टेक॥
काहे को अपना मन डुलावे, 
यहु तन अपना नीका धरना ।
कोटि वर्ष तू काहे न जीवे, 
विचार देख आगैं है मरना ॥१॥
काहे न अपनी बाट सँवारे, 
संयम रहना सुमिरण करणा ।
गहला दादू गर्व न कीजे, 
यहु संसार पंच दिन भरणा ॥२॥
अरे ! यह देह सत्य नहीं है, अन्त में इसे मिट्टी में मिलना है, फिर घमण्ड से इसे मोड़-मोड़ कर क्यों चलता है ?
अपने मन को विषय प्राप्ति के लिये क्यों चंचल कर रहा है । यह अपना शरीर अच्छी प्रकार सदाचार में ही रखना चाहिये । तू कोटि वर्ष तक जीवे तो भी विचार करके देख, आगे मरना ही होगा ।
क्यों नहीं अपने कल्याण का मार्ग सुधारता है ? तुझे संयम से रहते हुये हरि स्मरण करना ही चाहिये । अरे ! तू विषयों से पागल होकर गर्व मत कर, यह संसार यात्रा तुझे पांच दिन में ही पूरी करनी है अर्थात् सात बार में एक जन्म का एक मरण का चला जाता है, इससे पांच दिन ही जीवन के शेष रहते हैं । अतः तुझे शीघ्रातिशीघ्र कल्याण का साधन करना चाहिये ।
उक्त पद सुनाकर दादूजी ने कहा - हरि प्राप्ति के साधन मार्ग में सिंह के समान शौर्य दिखावे और हरि के लिये अपना जीवत्व अहंकाररूप मस्तक दे, तब ही हरिसिंह का अर्थ सफल हो सकता है । अन्यथा नाम सिंह और काम गीदड़ के समान हो तब हरिसिंह नाम सफल नहीं होता है ।
(क्रमशः)

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