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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८० =*
*= गूलर गमन =*
विद्याद में ही माधवदासजी अपने सेवकों सहित दादूजी महाराज के पास आये और सत्यराम साष्टांग दंडवत करके हाथ जोड़े हुये सामने बैठ गये फिर अवसर देखकर माधवदासजी ने तथा उनके सेवकों ने प्रेमपूर्वक दादूजी महाराज से प्रार्थना की - आप यहां से गूलर की जनता के कल्याणार्थ गूलर ही पधारें । उन लोगों का प्रेमपूर्वक आग्रह देखकर दादूजी ने स्वीकार कर लिया ।
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फिर विद्याद से पधारते समय हरिसिंह आदि ने दादूजी को प्रणाम सत्यराम किया और श्रीस्वामी दादूदयालु महाराज की जय हो, जय हो, जय हो, जोर से ध्वनि की । विद्याद से गूलर के पास आये तब माधवदासजी अपने सेवकों के साथ संकीर्तन करते हुये दादूजी के सामने जाकर शिष्टाचार पूर्वक ग्राम में लाये । दादूजी महाराज ने भी वहां के भक्तों को दर्शन तथा सत्संग से आनन्दित किया । वहां के भक्तों ने दादूजी महाराज की अच्छी सेवा की ।
*= छोटी पालड़ी पधारना =*
गूलर के भक्तों को सुख प्रदान करके फिर छोटी पालड़ी के सेवक कान्हरदासजी के आग्रह से उनके पधारे । कान्हरदासजी बहुत अच्छे सेवक थे । वे संपूर्ण का त्याग करके ही गुरुदेव दादूजी की संगति में आये थे और दादूजी महाराज के सत्संग से उन्होंने परमानन्द प्राप्त किया था । एक दिन कान्हरदासजी ने दादूजी से पूछा - "प्रभु का प्रत्यक्ष दर्शन कैसे हो ? दादूजी ने कहा -
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"दादू भीगे प्रेम रस, मन पंचों का साथ ।
मगन भये रस में रहे, तब सन्मुख त्रिभुवन नाथ ॥"
जब मन पांचों ज्ञानेन्द्रियों के सहित प्रभु-प्रेम-रस से भीगता है, प्रेमरस से युक्त होता है, फिर उसमें प्रेमरस की वृद्धि होने पर मन इन्द्रिय उसी के आनन्द में निमग्न रहने लगते हैं, तब त्रिभुवन नाथ परमात्मा उस साधक को प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं ।
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उक्त उपदेश सुनकर कान्हरदासजी अति प्रसन्न हुये और उक्त उपदेश के अनुसार ही साधन में लग गये । कान्हरदासजी ने दादूजी महाराज की पूर्णभक्ति भाव से सेवा की थी । कान्हरदासजी के निमित्त से वहां के अन्य लोगों में भी दादूजी महाराज के दर्शन सत्संग द्वारा प्रभु भक्ति का संस्कार जमा था । कान्हरदासजी दादूजी के सौं शिष्यों में हैं । फिर पादूग्राम के माहेश्वरी वियाणी गोत्र के वैश्य ढकू भक्त के अति आग्रह से पादू पधारे । उस समय ढकू को अति हर्ष हुआ ।
(क्रमशः)

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