शनिवार, 16 जुलाई 2016

= सर्वांगयोगप्रदीपिका(प्र.उ. २७/८) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज* 
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान 
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI 
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका१(ग्रन्थ२) ~ प्रथम उपदेश*
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*केचित् कविता कवित सुनावैं ।*
*कुंडलिया अरु अरिल बनावैं ॥*
*केचित् छंद सवैया जोरैं ।*
*जहां तहां के अक्षर चोरैं ॥२७॥*
कुछ साहित्यशास्त्री कुण्डलिया, कवित्त, अरिल आदि छन्दों में अपनी कविता सुनाना ही अपना चरम लक्ष्य समझ लेते हैं और इधर-उधर के अक्षर जोड़-तोड़ कर (अपनी मान-बडाई के लिये) छन्द, सवैया आदि बनाते रहते हैं ॥२७॥
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*केचित् बीणा बेणु बदीता ।*
*ताल मृदंग सहित संगीता ॥*
*केचित् नट की कला दिखावैं ।*
*हस्त विनोद मधुर सुर गावैं ॥२८॥*
कुछ आचार्य संगीतशास्त्र को अपने जीवन का लक्ष्य बनाकर वीणा, वंसी आदि वाद्ययन्त्रों से अपना समय व्यर्थ करते रहते हैं और ताल और मृदंग की ध्वनि पर नाचते-गाते रहते हैं । कुछ सज्जन नाट्य-शास्त्र को अपना चरम उत्कर्ष मान कर हाथ हिला-हिला कर ताली बजा-बजा कर, धनपतियों की खुशामद के लहजे में, जनानी आवाज में नटों की कला(भँडैती) दिखाते रहते हैं ॥२८॥
(क्रमशः)

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