॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
"श्री दादू अनुभव वाणी" टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
= विरह का अँग ३ =
.
विरह वियोगी मन भला, साँई का वैराग ।
सहज संतोषी पाइये, दादू मोटे भाग ॥१००॥
भगवद् - दर्शनार्थ विषयों से विरक्त, स्वाभाविक संतोषी, निर्मल मन, वियोगी भक्त जब विरह - वेदना से विकल रहता है, तभी भगवन् प्राप्त होते हैं और जिसे भगवत्, साक्षात्कार हो जाता है - वही संसार में बड़भागी माना जाता है ।
.
विरह उपजनि
दादू तृषा बिना तन प्रीति न उपजे,
शीतल निकट जल धरिया ।
जनम लगैं जिव पुणग१ न पीवे,
निर्मल दह दिश भरिया ॥१०१॥
समीप में शीतल जल रखा होने पर भी प्यास बिना प्राणी के मन में उसे पान करने की रूचि नहीं होती, यह एक बिन्दु१ भी नहीं पीता । वैसे ही शुद्ध ब्रह्म अस्ति, भाति, प्रिय रूप से सर्वत्र व्यापक है किन्तु जब तक जीव उन्हें प्राप्त करने के लिए विरह - वेदना से व्यथित नहीं होता, तब तक नहीं मिलते ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें