॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
"श्री दादू अनुभव वाणी" टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
= विरह का अँग ३ =
.
दादू क्षुधा बिना तन प्रीति न उपजे, बहु विधि भोजन नेरा ।
जनम लगैं जिव रती न चाखे, पाक पूरि बहुतेरा ॥१०२॥
विविध प्रकार के बहुत से गोजन समीप में पड़े रहने पर भी यदि प्राणी को क्षुधा न हो तो उनके खाने की रूचि उसके मन में नहीं होती । वैसे ही तृप्तिकारक संपूर्ण पाकों का शिरोमणि परब्रह्म - पाक अपनी अनन्त महिमा द्वारा सभी विश्व में परिपूर्ण है किन्तु विरह - वेदना बिना जीव जीवन - भर दौड़ - धूप मचा कर भी ब्रह्मानन्द का किंचित् मात्र भी अनुभव नहीं कर सकता ।
.
दादू तपत बिना तन प्रीति न उपजे, संग ही शीतल छाया ।
जनम लगैं जीव जाणे नांहीं, तरुवर त्रिभुवन राया ॥ १०३ ॥
शीतकाल में अति निकट श्रेष्ठ वृक्ष की शीतल छाया हो तो भी तेज धूप के बिना उसमें बैठने की रूचि नहीं होती । वैसे ही जब तक विरह – व्यथा प्रकट नहीं होती, तब तक प्राणी त्रिलोक - स्वामी परमात्मा के स्वरुप को जानने के लिए जन्म - पर्यन्त यत्न करे तो भी नहीं जान पाता ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें