गुरुवार, 28 जुलाई 2016

= सर्वांगयोगप्रदीपिका(प्र.उ. ३५/६) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज* 
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान 
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI 
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका१(ग्रन्थ२) ~ प्रथम उपदेश*
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*केचित् रक्त पीत पट कीने ।*
*पुनि बस्तर वोढहिं अति झीने ।* 
*केचित् दीसै रंगा चंगा ।*
*पाट पटम्बर वोढहिं अंगा ॥३५॥*
कुछ लोग लाल-पीले वस्त्र ओढ़ने में मोक्षप्राप्ति मान बैठते हैं, और दूसरे अत्यन्त महीन पारदर्शी वस्त्र पहनने में ही अपनी मुक्ति मानते हैं । कुछ लोग हमेशा अच्छे रंगे हुए वस्त्र पहनते हैं, और कुछ रेशम या पटसन के वस्त्र शरीर पर ओढ़ कर ही अपना लक्ष्य पूर्ण समझ लेते हैं ॥३५॥
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*केचित् रंगहि काथ महिं कपरा ।*
*करि प्रपंच बैठहिं अति लपरा ।* 
*केचित् टाट पहरि दिखरावैं ।*
*बहुत भांति करि लोक रिझावैं ॥३६॥*
कुछ पाखण्डी लोग किसी छाल के क्वाथ में कपडे रंगकर उन्हें पहन कर बडी टीम टाम के साथ कथावाचक के रूप में बैठते हैं, और कुछ हैं कि जो टाट(फटी पुरानी बोरी) को वस्त्र के रूप में शरीर पर रखते हुए अपने वैराग्य का ढोंग रचते हैं, एवं तरह-तरह से लोगों को अपनी और आकृष्ट करने का प्रयास करते हैं ॥३६॥ 
(क्रमशः)

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