गुरुवार, 28 जुलाई 2016

= विन्दु (२)८१ =

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८१ =*
*= पुष्कर पधारना =*
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रियां में पुष्करराज के प्रीतम नामक ब्राह्मण दादूजी के उपदेश से विशेष प्रभावित हुये थे, इससे प्रीतम ने दादूजी से प्रेमपूर्वक प्रार्थना की - स्वामिन् ! कुछ दिन के लिये आप पुष्कर राज अवश्य पधारें और मेरी प्रबल इच्छा है कि अभी मेरे साथ ही आप पधारे ।
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प्रीतम का प्रेम देखकर दादूजी ने स्वीकार कर लिया । फिर पुष्कर प्रस्थान के समय रियां नरेश ने भी प्रीतम को कहा - स्वामीजी तथा स्वामीजी के शिष्यों का विशेषरूप से ध्यान रखना, इनको कोई कष्ट नहीं होना चाहिये । प्रीतम ने कहा - ऐसा कैसे हो सकता है ? मैं लेकर जा रहा हूँ पूरा-पूरा ध्यान रखूंगा ।
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फिर प्रस्थान के समय रियां नरेश माधवदास तथा मोहनलाल ब्राह्मण आदि ने सत्यराम प्रणाम किया फिर वहां से प्रस्थान करके शनैः शनैः ब्रह्मचिन्तन करते हुये पुष्कर पधार गये । प्रीतम ने दादूजी को गुप्तेश्वर महादेव के स्थान पर ठहराया । यहां दादूजी के दर्शनार्थ बहुत लोग आते थे ।
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दादूजी यहां अधिकतर समपर्ण भक्ति का ही उपदेश करते रहे । अर्थात् सब कुछ प्रभु का ही है, उसे ही समपर्ण करना चाहिये, अपना कुछ भी नहीं मानना चाहिये । एक दिन प्रीतम ब्राह्मण प्रणाम करके हाथ जोड़े हुये कुछ जिज्ञासा से दादूजी के सामने बैठे तब दादूजी उनके मनकी स्थिति जानकार उनके अधिकारानुसार यह पद बोला - ...
(क्रमशः)


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