बुधवार, 13 जुलाई 2016

= सर्वांगयोगप्रदीपिका(प्र.उ. २१/२) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका१(ग्रन्थ२) ~ प्रथम उपदेश*
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*केचित् मलिन मंत्र अपराधैं ।*
*बशीकरण उच्चाटन साधैं ॥*
*केचित् मुये मसान जगावैं ।*
*थंभन मोहन अधिक चलावैं ॥२१॥*
कुछ आचार्य लोग अघोर तन्त्र की साधना से मोक्ष प्राप्ति होना बतलाते हैं, उसके तामस मन्त्रों की आराधना में जीवन लगा देते हैं । कुछ लोग इसी तरह मन्त्र शास्त्र के प्रधान छह प्रयोगों(मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, स्तम्भन तथा शान्ति) में ही मोक्ष समझते हुए जीवन भर साधना इन मन्त्रों की करते हैं । ऐसे ही कुछ लोग श्मशान में जाकर उक्त मन्त्रों की आराधना करते हैं ॥२१॥
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*केचित् वनिता कर्षण करहीं ।*
*भूपति मोहि धूर्त धन हरहीं ॥*
*केचित् करहिं कलंक पसारा ।*
*धात रसाइन मारहिं पारा ॥२२॥*
कुछ सम्मोहन तन्त्र को ही सब कुछ समझते हुए, उसके माध्यम से नारी-सम्मोहन तथा राजा-धनपति आदि के सम्मोहन के नाम पर लोगों से धन-सम्पति ऐंठते रहते हैं । कुछ लोग छल-कपट से दूसरों में दोष दिखाकर उनकी निन्दा करते हुए अपनी सिद्धाई का ढिंढोरा पीटते रहते हैं और कहते रहते हैं कि हमें धातु रसायन तथा पारद के ऐसे-ऐसे प्रयोगों का ज्ञान है कि हम उसके सहारे स्वेच्छया आकाश-पाताल कहीं भी जा सकते हैं ॥२२॥
(क्रमशः)

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