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*https://www.facebook.com/DADUVANI*
*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८० =*
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*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८० =*
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पीथा की दृढ़ परिज्ञा सुनकर सर्व हितैषी संत प्रवर दादूजी ने उसको इस पद से उपदेश किया -.
*= पीथा को निर्वाण उपदेश =*
जियरा राम भजन कर लीजे ।
साहिब लेखा माँगे गोरे,
जियरा राम भजन कर लीजे ।
साहिब लेखा माँगे गोरे,
उत्तर कैसे दीजे ॥टेक॥
आगे जाय पछतावन लागो,
आगे जाय पछतावन लागो,
पल पल यहु तन छीजे ।
तातैं जिय समझाय कहूँ रे,
तातैं जिय समझाय कहूँ रे,
सुकृत अब तैं कीजे ॥१॥
राम जपत जम काल न लागे,
राम जपत जम काल न लागे,
संग रहैं जन जीजे ।
दादू दास भजन कर लीजे,
दादू दास भजन कर लीजे,
हरिजी की रास रमीजे ॥२॥
मन के व्याज से पीथा निर्वाण को उपदेश कर रहे हैं - अरे मन ! शरीर के ठीक रहते-रहते ही राम का भजन करले, फिर नहीं होगा । जब प्रभु तेरे से जीवन का हिसाब माँगेगे तब बिना भजन किये उन्हैं कैसे उत्तर देगा ? कारण, तू गर्भ में उनके आगे भजन करने की प्रतिज्ञा करके आया था । यह शरीर क्षण-क्षण में क्षीण हो रहा है, आगे वृद्धावस्था में जाकर तू पश्चात्ताप करने लगेगा ।
इसी लिये हे मन ! तुझे समझाकर कह रहा हूं, तू अभी से भजनादि सुकृत करले । रामनाम जपने से यम और काल का जोर जापक पर नहीं लगता है । भक्त भगवान् के साथ अभेद भाव से रहकर जीवित रहता है । मेरी बात मानकर भजन द्वारा प्रभु को प्राप्त करले । उन हरि की शरण में रहकर उनके साथ अभेद स्थिति का आनन्दानुभवरूप रास खेल ।
इस बार दादूजी महाराज एक वर्ष तक करड़ाले में निवास करते रहे थे । यह समय वि. स. १६५१ का था । फिर पीथा निर्वाण दादूजी के उपदेश से ईश्वर भजन में लग गया था और आगे चलकर अच्छा संत हो गया था ।
फिर दादूजी ने करड़ाले से भ्रमण करने का विचार किया तब करड़ाले के भक्तों ने सत्यराम प्रणाम किया और कहा - भगवन् ! आपकी कृपा हम लोगों पर सदा बनी रहनी चाहिये । फिर दादूजी ने उनको अपने वचनों से संतुष्ट किया पश्चात् वहाँ से विचरते हुए विद्याद ग्राम में पधारे ।
(क्रमशः)
मन के व्याज से पीथा निर्वाण को उपदेश कर रहे हैं - अरे मन ! शरीर के ठीक रहते-रहते ही राम का भजन करले, फिर नहीं होगा । जब प्रभु तेरे से जीवन का हिसाब माँगेगे तब बिना भजन किये उन्हैं कैसे उत्तर देगा ? कारण, तू गर्भ में उनके आगे भजन करने की प्रतिज्ञा करके आया था । यह शरीर क्षण-क्षण में क्षीण हो रहा है, आगे वृद्धावस्था में जाकर तू पश्चात्ताप करने लगेगा ।
इसी लिये हे मन ! तुझे समझाकर कह रहा हूं, तू अभी से भजनादि सुकृत करले । रामनाम जपने से यम और काल का जोर जापक पर नहीं लगता है । भक्त भगवान् के साथ अभेद भाव से रहकर जीवित रहता है । मेरी बात मानकर भजन द्वारा प्रभु को प्राप्त करले । उन हरि की शरण में रहकर उनके साथ अभेद स्थिति का आनन्दानुभवरूप रास खेल ।
इस बार दादूजी महाराज एक वर्ष तक करड़ाले में निवास करते रहे थे । यह समय वि. स. १६५१ का था । फिर पीथा निर्वाण दादूजी के उपदेश से ईश्वर भजन में लग गया था और आगे चलकर अच्छा संत हो गया था ।
फिर दादूजी ने करड़ाले से भ्रमण करने का विचार किया तब करड़ाले के भक्तों ने सत्यराम प्रणाम किया और कहा - भगवन् ! आपकी कृपा हम लोगों पर सदा बनी रहनी चाहिये । फिर दादूजी ने उनको अपने वचनों से संतुष्ट किया पश्चात् वहाँ से विचरते हुए विद्याद ग्राम में पधारे ।
(क्रमशः)

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