गुरुवार, 28 जुलाई 2016

= विरह का अंग =(३/१२१-३)

॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= विरह का अँग ३ =**
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दादू भलका मारे भेद सों, सालै मँझि पराण ।
मारण हारा जाणि है, कै जिहिं लागे बाण ॥१२१॥
भगवन् भक्त के विरह - बाण बड़े रहस्य - पूर्वक मारते हैं । किसी अन्य को तो पता भी नहीं लगता, किन्तु भक्त के मन में भारी व्यथा होती रहती है । उस व्यथा को या तो मारने वाले भगवन् जानते हैं या जिसके बाण लगता है, यह जानता है ।
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दादू सो शर हमको मारिले, जिहिं शर मिलिये जाइ ।
निश दिन मारग देखिये, कबहूं लागे आइ ॥१२२॥
भगवन् ! आप हमें विरह - व्यथासे मारना ही चाहते हैं, तो यह तीव्रतर विरह - बाण मारिये, जिसके लगते ही हम देहादि आसक्ति से ऊंचे उठकर शीघ्र ही आपसे आ मिलें । हम निश - दिन उस तीव्रतर विरह - बाण की प्रतीक्षा कर रहे हैं - यह कब आकर हमारे लगेगा ।
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जिहिं लागी सो जागि है, बेध्या करण पुकार ।
दादू पिंजर पीड़ है, साले बारंबार ॥१२३॥
जिसके विरह - बाण की चोट लभी है, यह उससे युक्त होकर भगवद् - दर्शनार्थ पुकारता हुआ जागता रहता है और उसके हृदय - पिंजरे में स्थित यह पीड़ा उसे बारंबार व्यथित करती रहती है ।
(क्रमशः)

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