卐 सत्यराम सा 卐
करणी किरका को नहिं, कथनी अनंत अपार ।
दादू यों क्यों पाइये, रे मन मूढ गँवार ॥
कहबा सुनबा मन खुशी, करबा औरै खेल ।
बातों तिमिर न भाजई, दीवा बाती तेल ॥
दादू करबे वाले हम नहीं, कहबे को हम शूर ।
कहबा हम थैं निकट है, करबा हम थैं दूर ॥
कहे कहे का होत है, कहे न सीझै काम ।
कहे कहे का पाइये, जब लग हृदै न आवै राम ॥

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