॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
"श्री दादू अनुभव वाणी" टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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= विरह का अँग ३ =
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विरह - ज्ञानाग्नि
विरह अग्नि का दाग दे, जीवत मृतक गोर ।
दादू पहली घर किया, आदि हमारी ठौर ॥९७॥
कुछ लोग देहान्त होने पर देह को जलाने या मिट्टी में दबाने से सुगति मानते हैं अन्यथा दुर्गति, उसी प्रथा को आगे रख कर कह रहे हैं - हमने तो अपने शरीर को विरहाग्नि से और अज्ञान को ज्ञानाग्नि से जलाकर तथा जीवितावस्था में ही मृतक सामान निर्द्वन्द्व हो सहजावस्था रूप कब्र में प्रविष्ट होकर, मरने से पहले ही हमारे ब्रह्मरूप आदि स्थान में निष्ठा रूप घर तैयार कर लिया है अर्थात ब्रह्मस्वरुप में ही स्थित रहते हैं ।
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विरह पतिव्रत
दादू देखे का अचरज नहीं, अणदेखे का होइ ।
देखे ऊपरि दिल नहीं, अणदेखे को रोइ ॥९८॥
विरह - पूर्वक पतिव्रत दिखा रहे हैं - देखे हुये मायिक प्रपंच को देखने में कोई आश्चर्य की बात नहीं । जिन परमात्मा का अब तक दर्शन नहीं हुआ है, उनका देखना ही आश्चर्य रूप माना जाता है । अत: देखे हुये मायिक प्रपंच पर अपना मन न लगा कर बिना देखे हुये भगवन् के दर्शनार्थ ही विरह - पूर्वक रोते रहना चाहिए । आमेर में दो सिद्ध बंद गुफा में घुसकर महाराज के पास बैठ काश्मीर में दौड़ते हुये घोड़े देख कर बात करने लगे थे - ये दादूजी को नहीं दीखते होंगे ? इस पर यह साखी कही थी । प्रसंग कथा दृ - सु - सि - त - ७/२९१ में देखो ।
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विरह उपजनि
पहली आगम विरह का, पीछे प्रीति प्रकाश ।
प्रेम मगन लै लीन मन, तहां मिलन की आश ॥९९॥
९९ - १११ में विरह उत्पत्ति आदि विरह - विषयक विचार कह रहे हैं - प्रथम हृदय में भगवद् - विरह प्रकट होता है, फिर भगवन् में विशेष प्रीति प्रकट होती है । पश्चात् भक्त का मन प्रेम में निमग्न रहने लगता है और वृत्ति भगवत् - स्वरुप में लीन रहने लगती है, तब निश्चय पूर्वक भगवत् मिलन की आशा हो जाती है ।
(क्रमशः)

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