रविवार, 10 जुलाई 2016

=७५=

卐 सत्यराम सा 卐
मेरी मेरी करत जग खीना, देखत ही चल जावै ।
काम क्रोध तृष्णा तन जालै, तातैं पार न पावै ॥ टेक ॥
मूरख ममता जन्म गमावै, भूल रहे इहिं बाजी ।
बाजीगर को जानत नांही, जन्म गंवावै वादी ॥ १ ॥
प्रपंच पंच करै बहुतेरा, काल कुटुम्ब के तांई ।
विषै के स्वाद सबै ये लागे, तातैं चीन्हत नांही ॥ २ ॥
येता जिय में जानत नांहीं, आइ कहाँ चल जावै ।
आगे पीछे समझै नांहीं, मूरख यूं डहकावै ॥ ३ ॥
ये सब भ्रम भान भल पावै, शोध लेहु सो साँई ।
सोई एक तुम्हारा साजन, दादू दूसर नांही ॥ ४ ॥
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साभार ~ Yogendra G Bhatia

मनुष्य-जीवन का परम कर्तव्य
एक भ्रमर सायंकाल के समय एक कमल पर बैठकर उसका रस पी रहा था l इतने में सूर्यास्त होने को आ गया l सूर्यास्त होने पर कमल सकुचित हो जाता है l अत: कमल बंद होने लगा, पर रसलोभी मधुप विचार करने लगा - 'अभी क्या जल्दी है, रात भर आनन्द से रसपान करते रहें - रात बीतेगी l सुन्दर प्रभात होगा l सूर्यदेव उदित होंगे l उनकी किरणों से कमल पुन: खिल उठेगा, तब मैं बाहर निकल जाऊँगा l' वह भ्रमर इस प्रकार विचार कर ही रहा था कि हाय ! एक जंगली हठी ने आकर कमल को डंडी समेत उखाड़कर दांतों में दबाकर पीस डाला l यों उस कमल के साथ भ्रमर भी हाथी का ग्रास बन गया l इस प्रकार पता नहीं, कालरूपी हाथी कब हमारा ग्रास कर जाये l मृत्यु आने पर एक श्वास भी अधिक नहीं मिलेगा l मृत्युकाल आने पर एक क्षण के लिए भी कोई जीवित नहीं रह सकता l उस समय कोई कहे कि 'मैंने वसीयतनामा(Will) बनाया है l कागज़(Documentary) तैयार है l केवल हस्ताक्षर करने बाकि हैं l एक श्वास से अधिक मिल जाय तो मैं सही कर दूँ l' पर काल यह सब नहीं सुनता l बाध्य होकर मरना ही पड़ता है l यह है हमारे जीवन कि स्थिति l अतएव मानव-जीवन कि सफलता के लिए संसार के पदार्थों से ममता उठाकर भगवान् में ममता करनी चाहिए l
हम प्राणी-पदार्थों में ममता बढ़ाते हैं, पर यह ममता स्वार्थमूलक है l स्वार्थ में जरा-सा धक्का लगते ही यह ममता टूट जाती है, इसीलिए भगवान् श्री रामचन्द्रजी विभीषण से कहते हैं -'माता, पिता, भाई, स्त्री, शरीर, धन, सुहृद, मकान, परिवार - सब की ममता के धागों को सब जगह से बटोर लो l' ममता को धागा इसलिए कहा गया है कि उसे टूटते देर नहीं लगती l 'फिर उन सब की एक मजबूत डोरी बट लो l उस डोरी से अपने मन को मेरे चरणों से बांध दो l अर्थात मेरे चरण ही तुम्हारे रहे, और कुछ भी तुम्हारा न हो l सारी ममता मेरे चरणों में ही आकर केन्द्रित हो जाय l ऐसा करने से क्या होगा ? ऐसे सत्पुरुष मेरे ह्रदय में वैसे ही बसते हैं, जैसे लोभी के ह्रदय में धन l अर्थात लोभी के धन की तरह मैं उन्हें अपने ह्रदय में रखता हूँ l' अत: संसार के प्राणी-पदार्थों से ममता हटाकर एकमात्र भगवान् में ममता करनी चाहिए l

मानव-जीवन का लक्ष्य (५६) 
गीताप्रेस, गोरखपुर

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