बुधवार, 27 जुलाई 2016

= विन्दु (२)८१ =


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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८१ =*
*= मोहनलाल को उपदेश =*
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रियां नरेश माधवदासजी के कार्यकर्ता मोहनलालजी ब्राह्मण एक दिन अवकाश प्राप्त होने पर दादूजी के पास आये और प्रणाम सत्यराम करके हाथ जोड़े हुये कुछ जिज्ञासा लेकर सामने बैठे थे । तब उनके मनकी भावना जान कर उनके अधिकार के अनुसार दादूजी ने यह पद बोला ~
मन मोहन मेरे मनहिं मांहिं, कीजे सेवा अति तहां ॥टेक॥
तहँ पायो देव निरंजना, परकट भयो हरि इहिं तना ।
नैनन हीं देखूं अघाय, प्रकट्यो है हरि मेरे भाय ॥१॥
मोहि कर नैनन की सैन देय, प्राण मूंस हरि मोर लेय ।
तब उपजे मोकों इहै बान, निज निरखत हूँ सारंगप्रान ॥२॥
अंकुर आदैं प्रकट्यो सोय, वैन बाण तातैं लागे मोहि ।
शरणे दादू रह्यो जाय, हरि चरण दिखावे आप आय ॥३॥
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मेरे मन मोहन भगवान् मन में ही स्थित हैं, उनकी सेवा-पूजा वहां मन में ही विशेषरूप से करनी चाहिये । वहां ही हमने निरंजन देव को प्राप्त किया है । वे हरि दया करके इस शरीर के हृदय देश में मेरे भावाधीन ही प्रकट हुये हैं, मैं उन्हें ज्ञाननेत्रों से तृप्त होकर देखता हूं ।
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वे हरि ध्यानावस्था में मुझे अपने से अभिन्न करने के लिये, अपने हाथ और नेत्रों की सैन देते हैं तथा मेरे मन को चुरा लेते हैं । तब मेरे हृदय में अद्वैत रूप से देखने का स्वभाव उत्पन्न हो जाता है फिर मैं भगवान् को निज स्वरूप ही देखने लगता हूं । यह अद्वैत स्वभाव बीज रूप से मुझ में आदि काल का ही है । उसी का भक्तिरूप अंकुर प्रकट हुआ है ।
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इस अंकुर के प्रकट होने से ही मेरे सद्गुरु के वचन-बाण लगे हैं और मैं हरि की शरण होकर, भजन द्वारा उनके पास ही जा रहा हूँ । तब ही तो स्वयं हरि आकर अपने चरणों का दर्शन कराते हुये मुझे अपने से अभिन्न कर रहे हैं ।
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उक्त उपदेश सुनकर मोहनलालजी ब्राह्मण को वैराग्य हो गया । फिर उन्होंने गृहस्थ को त्याग दिया और साधु भेष धारण कर लिया । फिर आसोप नगर में जाकर दादूजी की साधन पद्धति के अनुसार निर्गुण ब्रह्म का भजन करने लगे, इसी से मोहनजी भजनीक के नाम से प्रसिद्ध हुये । ये दादूजी के ५२ शिष्यों में माने जाते हैं ।
(क्रमशः)

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