बुधवार, 27 जुलाई 2016

= सर्वांगयोगप्रदीपिका(प्र.उ. ३३/४) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज* 
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान 
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI 
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका१(ग्रन्थ२) ~ प्रथम उपदेश*
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*केचित् अभख भखत न सकांहीं ।*
*मदिरापान मांस पुनि खांहीं ।* 
*केचित् बपुरे दूधाधारी ।*
*खांड खोपरा दाख छुहारी ॥३३॥*
कुछ लोग अभक्ष्य वस्तुओं(कुत्ते, साँप, शव, विष्ठा) को नि:शंक खाने में ही ‘मोक्ष’ समझते हैं और भोजन के रुप में मैथुन, मांस, मैथुन, मत्स्य को धडल्ले से प्रयोग करते हैं । (इनके विपरीत) कुछ लोग दूध के अतिरिक्त अन्य आहार लेने से अपनी मुक्ति में विध्न मानते हैं । और सस्ते अन्न की बजाय नारियल, मिश्री, दाख, छुहारा, बादाम महँगी वस्तुएँ खाने में ही अपने ‘मोक्ष’ को नजदीक बुलाने की कोशिश करते हैं ॥३३॥
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*केचित् कंद मूल खनि खांहीं ।*
*एकाएक रहैं बन माहीं ॥*
कुछ धार्मिक नेता कन्द, मूल, फल ही खाते हैं, वह भी स्वयं खोदकर या बहुत-थो़डा(एक बार) ही खाते हैं और अकेले(एकाकी) वन में रहते हैं । इस अरण्यवास तथा एकान्तवास को ही वे अपना मुक्तिदाता मान बैठे हैं । 
*४. वस्त्रकृत पाखण्ड वर्णन* 
*केचित् कासायादिक पहिरैं ।*
*जपहिं जाप पैठहिं जल गहरैं ॥३४॥*
कुछ सम्प्रदायों वाले काषाय वस्त्र(रंगा हुआ, गेरुआ-खाकी-नीला-पीला-काला वस्त्र) धारण करने में तथा अन्य मत वाले बारहों महिने(सर्दी-गर्मी में) गहरे जल में खडे होकर मन्त्र-जाप करने में ही ‘मुक्ति’ मानते हैं ॥३४॥ 
(क्रमशः)

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