🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
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🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका१(ग्रन्थ२) ~ प्रथम उपदेश*
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*केचित् माला तिलक बनावैं ।*
*विष्णु उपासी भक्त कहावैं ॥*
*केचित् शिव शिव जपहिं अपारा ।*
*गरै लिंग अरु लावहिं छारा ॥१७॥*
कुछ लोग लम्बे चौ़डे तिलक तथा लम्बी-लम्बी मालायें पहन कर अपने को वैष्णव भक्त कहलाने में ही गौरव मान बैठते हैं । दूसरे शिव की नाम-आराधना करते हुए गले में लिंग का चिन्ह पहनते हैं तथा शरीर पर भस्म रमाते हैं ॥१७॥
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*केचित् कर्म सु थापहिं जैंना ।*
*केश लुंचाइ करहिं अति फैंना ॥*
*केचित् मुद्रा पहिरै कांनं ।*
*कापालिका भ्रष्ट मत जांनं ॥१८॥*
कुछ जैन मत के अनुयायी होकर उन्हीं के बताये कर्मों से अपना मोक्ष मान बैठते हैं और अपने हाथ से सिर के बाल उखा़डना आदि पाखण्ड करते हैं । कुछ जोगी लोग कान में मुद्रा(गोल छल्ला) पहन कर अपने को मोक्ष का अधिकारी मान बैठते हैं । और कुछ लोग(कापालिक) मनुष्य की खोपडी का पात्र तथा माला पहन, भ्रष्ट आचरण करके भी मोक्ष प्राप्ति की आस लगा बैठते हैं ॥१८॥
(क्रमशः)

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