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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८० =*
= पीथा को सत्य रास दिखाना =
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दादूजी महाराज ने यह पद बोला -
घट घट गोपी घट घट कान्ह,
घट घट राम अमर सु स्थान ॥टेक॥
गंगा यमुना अंतर वेद,
सरस्वती नीर बहे प्रस्वेद ॥१॥
कुंज केलि तहँ परम विलास,
सब संगी मिल खेलैं रास ॥२॥
तहँ बिन बैना बाजैं तूर,
विकसे कमल चंद अरु सूर ॥३॥
पूरण ब्रह्म परम परकाश,
तहँ निज देखे दादू दास ॥४॥
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प्रत्येक शरीर में वृत्ति रूप गोपियाँ और साक्षी चेतन रूप कृष्ण हैं तथा प्रत्येक शरीर में ही रमने वाले अमर राम रूप कृष्ण का अष्टदल-कमल रूप वृन्दावन स्थान है ।
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पिंगला रूप गंगा है और इड़ा रूप यमुना है । उन दोनों के मध्य षट् चक्र अन्तर्वेद देश है । जैसे सरस्वती पृथ्वी से उमगती है, वैसे ही सुषुम्ना रूप सरस्वती मिलने पर अर्थात् कुंभक होने पर शरीर से प्रस्वेद आता है, वही सरस्वती का नीर प्रवाह है ।
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साक्षी चेतनाकार वृत्तियों को जो परमानन्द होता है, वही कुंज-क्रीड़ा है । मन, बुद्धि, इन्द्रियादि सभी साथी मिलकर भगवत् परायणता रूप रास खेलते हैं ।
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उस आन्तर राम में बिना वाणी ही वृत्ति मात्र से गान होता है, बिना हाथों ही अनाहत नाद रूप नगाड़ा बजता है । हृदय कमल खिल जाता है ।
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इड़ा नाडी रूप चन्द्रमा और पिंगला नाड़ी रूप सूर्य, सुषुम्ना नाड़ी रूप अग्नि में लय हो जाते हैं, तब वहाँ पर एक मात्र परम प्रकाश स्वरूप पूर्ण ब्रह्म को उनके निजी भक्त निजात्म रूप से देखते हैं ।
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उक्त पद समाप्त होते ही वहां पर्वत शिखर पर ही शरद् पूर्णिमा की रात्रि और यमुना नदी का प्रवाह दीखने लगा फिर देखते-देखते ही सहसा वहाँ बहुत सी गोपियाँ और श्री कृष्ण प्रकट हो गये और वहां पर्वत शिखर पर ही रास आरम्भ हो गया ।
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बड़ी विचित्र गति से श्री कृष्ण और गोपियों का नृत्य होने लगा । उन बाल कृष्ण की नृत्य कला का तो वर्णन किसी प्रकार हो ही नहीं सकता । वह तो मन और वाणी का अविषय ही है । न तो मन उसका यथार्थ रूप से संकल्प ही कर सकता है और न वाणी कह ही सकती है ।
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उस अद्भुत नृत्य कला को देखकर पीथा निर्वाण तो मंत्र मुग्ध-सा हो रहा था किन्तु उस समय केवल नृत्य ही दीख रहा था शब्द कुछ भी नहीं सुनाई दे रहा था । भगवान् कृष्ण कुछ भी नहीं बोल रहे थे ।
(क्रमशः)

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