शनिवार, 16 जुलाई 2016

=८८=

卐 सत्यराम सा 卐
तब सुख आनन्द आत्मा, जे मन थिर मेरा होइ ।
दादू निश्चल राम सौं, जे कर जाने कोइ ॥
मन निर्मल थिर होत है, राम नाम आनंद ।
दादू दर्शन पाइये, पूरण परमानन्द ॥ 
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साभार ~ @Ramjibhai Jotaniya
जो लोग योगसाधना नही कर पाते, उन्हेँ गृहस्थाश्रम योग का फल देता है । गृहस्थाश्रम मेँ धर्म मुख्य है जबकि काम गौण। गृहस्थाश्रम ग्यारह इन्द्रियोँ पर विजय पाने के लिए है । विवाह विलास के लिए नही बल्कि काम विनाश के लिए है । जो आनन्द योगी को समाधि मेँ मिलता है वही आनन्द गृहस्थ घर मेँ प्राप्त कर सकता है किन्तु इसके लिए पति पत्नी को एकान्त मेँ कृष्ण कीर्तन करना चाहिए ।
गृहस्थाश्रम बिगड़ता है कुसंग से अतः गृहस्थाश्रम को सुधारने के लिए सत्संग करना चाहिए ।
कश्यप की दो पत्नियाँ थी अदिति और दिति । उनका गृहस्थाश्रम श्रेष्ठ एवं दिव्य था। वे पवित्रतापूर्वक जीते हुए तपश्चर्या करते थे । अतः प्रभु उनके घर पुत्र बनकर आए । आज भी यदि कोई नारी अदिति की भाँति पयोव्रत करे और उसका पति कश्यप सा बने, तो भगवान उसके घर जन्म लेने को तैयार हैँ । अदिति का अर्थ है अभेदबुद्धि, ब्रह्माकार बुद्धि । ऐसी वृत्ति मेँ से ही ब्रह्मा का प्रकटीकरण होता है ।
कश्यप का अर्थ है मन । जिसकी मनोवृत्ति ब्रह्माकार हो गयी होती है, वही कश्यप है। यदि पत्नी अदिति और पति कश्यप बने तो परमात्मा उनके घर अवतार लेते हैँ, प्रकट होते हैँ ।
योगी ब्रह्मचिँतन द्वारा प्रभुमय हो सकता है, तो पवित्र गृहस्थ प्रभु को पुत्ररुप मेँ प्राप्त कर सकता है । पवित्र गृहस्थाश्रमी युगल भगवान को पुत्र के रुप मेँ पा सकते हैँ, किन्तु पहले उन्हेँ कश्यप और अदिति बनना होगा । जब तक देहदृष्टि होगी, तब तक काम पीछे पीछे आएगा । काम का नाश करने के लिए देहदृष्टि की अपेक्षा देवदृष्टि रखना होगा ।
लोग कहते हैँ कि जगत् बिगड़ गया है ! जगत नहीँ बल्कि मनुष्य की दृष्टि बुद्धि मन बिगड़ गये हैँ । किसी को भी भोग दृष्टि नहीँ बल्कि भगवत् दृष्टि से देखना चाहिए । दृष्टि सुधरेगी तो, तो सृष्टि भी सुधर जायेगी । दिति ही भेदबुद्धि है और अदिति अभेदबुद्धि, ब्रह्माकार वृत्ति है । दिति - भेदबुद्धि राक्षसोँ को जन्म देती है जैसे कि हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप। अदिति - अभेदबुद्धि । भगवान वामन को जन्म देती है ।
जगत को भेदभाव से नहीँ, अभेदभाव से देखना चाहिए । जिसकी बुद्धि मेँ भेद है, उसके मन मेँ भी भेद है । भेद विकार वासना को जन्म देता है । ज्ञानी सभी को अभेदभाव से देखते हैँ । अनेक मेँ एक का अनुभव करना ही तो ज्ञान है ।
दृष्टि भगवन्मय होगी तो हर कहीँ भगवान दिखायी देँगे । गोपियो की दृष्टि परमात्मा मेँ थी सो मथुरा मेँ रहने पर भी श्रीकृष्ण उन्हेँ गोकुल मे ही दिखाई देते थे वे उद्धव जी से कहती हैँ > 
"जित देखौँ तित श्याममयी है।
श्याम कुंज वन जमुना श्यामा, श्यामा गगन घन घटा छयी है। 
सब रंगन मेँ श्याम भरयो है, लोग कहत यह बात नयी है ।
नीलकंठ को कंठ श्याम है, मनो श्यामता फैल गयी है ।।"
ब्रह्माकार वृत्ति अदिति का सम्बन्ध कश्यप के साथ हुआ । कश्यप शब्द को यदि उलट दिया जाय तो होगा > पश्यक। उपनिषद के अनुसार "क" का अर्थ है ईश्वर और "पश्य" का अर्थ है देखना । अर्थात् सभी मेँ एक ईश्वर को देखने वाला ही कश्यप है । जब कश्यप की वृत्ति ब्रह्माकार ब्रह्ममयी हुई तो परमात्मा को प्रकट होना पड़ा

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