॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= विरह का अँग ३ =**
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दादू तो पिव पाइये, भावै१ प्रीति लगाइ ।
हेजैं२ हरि बुलाइये, मोहन मंदिर आइ ॥११५॥
यदि श्रद्धा१ पूर्वक भगवन् में प्रीति की जाय तो वे प्राप्त हो जाते हैं । प्रेम२ पूर्वक हरि का आह्वान करो, वे विश्व - विमोहन भगवन् तुम्हारे हृदय - मंदिर में आ जायेंगे ।
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*विरह - उपजनि*
दादू जाके जैसी पीड़ है, सो तैसी करे पुकार ।
को सुक्षम को सहज में, को मृतक तिहिँ बार ॥११६॥
त्रिविध विरह उत्पत्ति दिखा रहे हैं - जिस विरही भक्त के हृदय में जैसी विरह - वेदना होती है, यह वैसी ही पुकार करता है । जिसमें अल्प व्यथा होती है यह किंचित् समय पुकारता है, जिसमें तीव्र होती है यह स्वाभाविक जीवन भर पुकारता रहता है और जिसमें तीव्रतर अवस्था आ जाती है, यह तो एक क्षण भर का वियोग भी सहन नहीं कर सकता, तत्काल ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है ।
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*विरह - लक्षण*
दरद हि बूझे दरदवंद, जाके दिल होवे ।
क्या जाणे दादू दरद की, नींद भर सोवे ॥११७॥
विरह का लक्षण विरही ही जानता है, यह कह रहे हैं - जिसके हृदय में विरह -व्यथा उत्पन्न हुई है, यही उसको जानता है । जिनके हृदय में प्रकट नहीं हुई, उन सांसारिक प्राणियों को भगवद् - विरह - वेदना का अनुभव नहीं होता । उनकी तो विषय - सुख में ही अलम् बुद्धि रहती है, अत: वे दिन भर भोगों के लिए यत्न करते हैं और रात्रि को यथेष्ट सोते हैं, किन्तु भगवद् विरही जन रात - दिन रोते रहते हैं ।
(क्रमशः)

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