शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

= सर्वांगयोगप्रदीपिका(प्र.उ. २५/६) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज* 
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान 
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI 
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका१(ग्रन्थ२) ~ प्रथम उपदेश*
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*२. शास्त्रकृत पाखंड वर्णन*
*केचित् तुला रत्न भू दाना । अन्न बसन पुस्तक बिधि नाना ॥*
*केचित् कहै संसकृत बांनी१ । कठिन श्‍लोक सुनावहिं जांनी ॥२५॥*
(१. तुलना कीजिये-
‘‘एक: शब्द: सम्यग्ज्ञात: सुप्रयुक्त: स्वर्गे लोके च कामधुग्भवति’’
-पा० महाभाष्य, पस्पशाह्निक ।)
कुछ धनाभिमानी रत्न सुवर्ण आदि का तुलादान(अपने बराबर के वजन की सुवर्ण आदि का धातु का दान करना), पृथ्वी आदि का दान, अन्द-वस्त्र आदि का दान, पुस्तकों का दान आदि को मोक्ष का उपाय बतलाते हैं । कुछ वैयाकरण लोग शुद्ध संस्कृत भाषा के उच्चारण को ही मोक्ष-प्राप्त्युपाय बतलाते हैं१ । और नाना प्रकार के कठिन कठिन श्‍लोक सुनाकर लोगों को ठगते रहते हैं ॥२५॥
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*केचित् तर्कत शास्तर पाठी । कौशल विद्या पकरहिं काठी ॥*
*केचित् वाद विविधि मत जानैं । पढि व्याकरण चातुरी ठानैं ॥२६॥*
कुछ आचार्य शास्त्रपाठ को मोक्ष का साधन बताते हैं । और सकल विद्याओं में निष्णात होना ही अपना जीवन लक्ष्य बना लेते हैं । कुछ आचार्य आठों व्याकरण पढकर राजसभाओं में प्रतिपक्षी विद्वानों से शास्त्रार्थ करते हुए अपनी चतुरता(प्रवीणता) का ढिंढोरा पीटते रहते हैं ॥२६॥
(क्रमशः)

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