शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

= विन्दु (२)८० =

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८० =*
**= हरिसिंह को उपदेश =**
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इतना कहकर फिर दादूजी ने यह पद कहा -
"हरि मारग मस्तक दीजिये,
तब निकट परम पद लीजिये ॥टेक॥
इस मारग मांहीं मरणा, तिल पीछे पाव न धरणा ।
अब आगे होय सो होई, पीछे सोच न करणा कोई ॥१॥
ज्यों शूरा रण जूझे, तब आपा पर नहिं बूझे ।
शिर साहिब काज सँवारे, घण घावों आपा डारे ॥२॥
सती सत्य गह साँचा बोले, मन निश्चल कदे न डाले ।
वा के सोच पोच जिय न आवे, जग देखत आप जलावे ॥३॥
इस शिर सौं साटा कीजे, तब अविनाशी पद लीजे ।
ता का तब शिर सावत होवे, जब दादू आपा खोवे ॥४॥
प्रभु प्राप्ति के मार्ग में अपना अहंकार रूप शिर दिया जायगा, तब हृदय देश में समीप ही परमात्मा रूप परम पद प्राप्त होगा ।
इस परमार्थ मार्ग में मरने का प्रसंग आ जाय तो भी एक तिल भर भी पीछे नहिं हटना चाहिये । इसमें प्रवृत्त होने पर आगे जो होता है, वही होगा अर्थात् प्रभु ही प्राप्त होंगे । पीछे के धन जनादि का सोच कोई भी नहीं करे ।
जैसे वीर युद्ध क्षेत्र में युद्ध करता है, तब अपने पराये का ज्ञान उसे नहीं रहता है । वह शिर देकर भी अपने स्वामी का कार्य ठीक करता है, वैसे ही साधक विवेक वैराग्यादि रूप शस्त्रों के बहुत से घावों द्वारा अपना अहंकार त्यागकर प्रभु को प्राप्त करे ।
सती सत्य ग्रहण करके आगामी सत्य बातें कहती है, उसका मन निश्चल रहता है । कभी भी चंचल नहीं होता है । उसके मन में कायरता और चिन्ता नहीं आती है । जगत के प्राणियों के देखते-देखते ही अपने शरीर को जलाकर पति लोक को जाती है, वैसे ही संत प्रभु-परायण होकर प्रभु को प्राप्त होते हैं ।
जब अविनाशी पद के बदले में अपना अहंकार रूप शिर दिया जाता है, तब उसका शिर प्रमाणित माना जाता है । ऐसा शौर्य धारण करो और सब प्रकार की कायरता को हृदय से दूर निकाल दो । 
 उक्त उपदेश सुनकर हरिसिंह दादूजी के शिष्य हो गये । फिर दादूजी ने कहा - मेरे शिष्यों में तुमको सिंह पदवी ही रहेगी । तुम हरिसिंह नाम से ही प्रसिद्ध होगे । फिर ये आगे चलकर अच्छे संत हो गये हैं । ये ५२ शिष्यों में हैं । इनकी वाणी भी है ।
(क्रमशः)


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