शनिवार, 30 जुलाई 2016

= सर्वांगयोगप्रदीपिका(प्र.उ. ३९-४०) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज* 
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान 
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI 
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका१(ग्रन्थ२) ~ प्रथम उपदेश*
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*५. तपस्याकृत पाखंड वर्णन*
*केचित् जटाजूट नख कीन्हें ।*
*नाना रूप जाइ नहिं चीन्हें ।*
*केचित् करहिं अज्ञान कसौटी ।*
*पंच अग्नि बारहिं मति छौटी ॥३९॥* 
(अब तरह-तरह की तपस्याओं का ढोंग रचनेवाले साधुओं का वर्णन कर रहे हैं-) कुछ ढोंगी लोग जटा-जूट और हाथ-पैर के नख बढा कर तरह-तरह का ऐसा अनोखा रूप धरते हैं कि साधारण आदमी उन्हें पहचान भी नहीं सकता । कुछ लोग मूर्खता की पराकाष्ठा दिखाते हुए अपनी मन्द बुद्धि के कारण अपनें चारों और अग्नि जला कर, पाँचवाँ ऊपर से सूर्य-यों पंचाग्नि तप का ढोंग रच कर शरीर को कष्ट देना ही परम लक्ष्य समझते हैं ॥३९॥
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*केचित् मेघाडम्बर बैठैं ।*
*शीत काल जलसाई पैठैं ।*
*केचित् धूम पान करि भूलैं ।*
*औंधे होइ बृच्छ सौं झूलैं ॥४०॥
कुछ लोग वर्षा ॠतु में बिना किसी छाया के खुले मैदान में बैठते हैं, कुछ शरद् ॠतु में जल में बैठकर तपस्या का दिखावा रचकर जनता को रिझाते हैं । कुछ दूसरे लोग नीचे गीली लकडी जलाकर उससे उठते धुएँ पर वृक्ष की डाल के सहारे ओंधे सिर लटकते हैं ॥४०॥ 
(क्रमशः)

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