शनिवार, 30 जुलाई 2016

= विन्दु (२)८१ =

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८१ =*
*= कालू ग्राम को जाना =*
उक्त पद सुनाकर प्रीतम ब्राह्मण को दादूजी ने कहा - तुम भी ऐसे ही ज्ञान में अपनी वृत्ति लगाओ । इस प्रकार दादूजी फाल्गुण मास में २० दिन तक पुष्कर में रहे । इन्हीं दिनों में कालू ग्राम का घड़सी वैरागी पुष्कर आया था । वह दादूजी के उपदेशों से प्रभावित होकर अपने ग्राम कालू में दादूजी महाराज को ले गया । उसकी प्रीति दादूजी में बहुत थी और बुद्धि तो दादूजी के चरणों में लगी ही रहती थी । फिर वह दादूजी महाराज का ही शिष्य हो गया ।
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*= घड़सी वैरागी को उपदेश =*
एक दिन घड़सी हाथ जोड़े हुये दादूजी के सामने जिज्ञासु भाव से बैठे थे । उनको देखकर दादूजी ने उनके अधिकारानुसार यह पद कहा -
"भाई रे घर ही में घर पाया ।
सहज समाय रह्यो ता माँहीं, सद्गुरु खोज बताया ॥टेक॥
खोल कपाट महल के दीन्हें, थिर सुस्थान दिखाया ॥१॥
भय अरु भेद भरम सब भागा, साँच सोई मन लागा ।
पिंड परे जहां जिव जावे, ता मैं सहज समाया ॥२॥
निश्चल सदा चले नहिं, कबहूँ देखा सबमें सोई ।
ताही से मेरा मन लागा, और न दूजा कोई ॥३॥
आदि अनन्त सोई घर पाया, अब मन अनत न जाई ।
दादू एक रँगैं रँग लागा, ता में रहा समाई ॥४॥
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हे भाई ! सद्गुरुजनों ने विचार द्वारा खोज करके बताया है, वही विश्व का निवास स्थान परब्रह्म रूप घर हमने शरीर रूप घर में ही प्राप्त किया है और सहजावस्था द्वारा उसी में समाये रहते हैं ।
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उस परब्रह्म घर के लिए प्रथम हम अनेक स्थानों में तथा साधनों में फिर आये थे किन्तु अन्त में वह अपने आत्म स्वरूप का विचार करने पर ही दिखाई दिया है । जब विचार ने हृदय महल के अज्ञानरूप कपाट खोल दिये तब अचल ब्रह्म रूप स्थान दिखाई दिया है ।
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अब तो भय और भेद जन्य सारा भ्रम बुद्धि से भाग गया है और जो सत्य ब्रह्म है, उसी में मन लगा है । शरीर का राग गिरने पर मुक्त्तात्मा जहाँ जाता है वा शरीराध्यास दूर होने पर जीवात्मा जहां जाता है, उसी सहज स्वरूप ब्रह्म चिन्तन में मन समाया रहता है ।
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जो सदा निश्चल रहता है, कभी भी चलायमान नहीं होता, उसी ब्रह्म को हमने सब में देखा है और अब सभी अवस्थाओं में हमारा मन उसी में लगा रहता है । मन में अन्य वस्तु-चिन्तन वा दूसरा कोई भी विचार नहीं आता है ।
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संसार का आदि और अनन्त जो ब्रह्म रूप घर है, वही हमने प्राप्त कर लिया है । अब हमारा मन अन्य ओर नहीं जाता है । एक अद्वैत ब्रह्म रंग के समीप आत्मा रूप रंग लगकर अद्वैत भाव से उसी में समा गया है ।
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उक्त उपदेश सुनकर घड़सी परमानन्द में निमग्न हो गये और सब मायिक मोह को त्याग दिया । घड़सीजी के कुटुम्ब ने दादूजी महाराज के पधारने के उपलक्ष्य में महान् उत्सव किया था । स्वामी दादूजी ने उनको सब कुछ प्रदान किया था । कालू ग्राम में दादूजी एक मास विराजे फिर वहां से मेड़ता पधारे थे । फिर घड़सीजी ने अपना साधन धाम कडेल, वसी को बनाया था । वहां रहकर भजन करते थे । ये दादूजी के ५२ शिष्यों में हैं ।
(क्रमशः)

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