गुरुवार, 7 जुलाई 2016

= सर्वांगयोगप्रदीपिका(प्र.उ. ११/२) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज* 
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान 
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI 
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका१(ग्रन्थ२) ~ प्रथम उपदेश*
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*अन्य मतवादों का खण्डन*
*इन बिन और उपाय हैं, सो सब मिथ्या जांनि ॥*
*छह दरसन अरु छ्यानवै, पाखंड कहूँ बखांनि ॥११॥*
उपर्युक्त इन तीनों(भक्तियोग, हठयोग एवं सांख्ययोग) के अतिरिक्त दूसरे आचार्यों ने ज्ञान के अन्य जो उपाय बताये हैं वे सब मिथ्या हैं, वाग्जाल मात्र हैं । उनमें छह दर्शन भी आ गये, और ९६ पाखण्ड मत भी आ गये । अर्थात् इन दर्शनों से जिज्ञासु की अपने लक्ष्य(ब्रह्मज्ञान) तक पहुँच नहीं हो पाती ॥११॥
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*१.कर्मकृत पाखंड वर्णन ~ चौपई*
*तौ केचित् करहिं यज्ञ बिधि वेदा ।*
*बाजपेय गो अरु बहु भेदा ॥*
*केचित् तीरथ तीरथ धावैं ।*
*दहिनावर्त पहुमि दै आवैं ॥१२॥*
(अब पहले विस्तार के साथ उन पाखण्ड मतों का ही विवेचन कर रहे हैं जो जिज्ञासु को लक्ष्य तक न पहुँचने देकर बीच में ही पथभ्रष्ट कर देते हैं-)
कुछ दार्शनि (मीमांसक) वेदविधि, (वेद में बतायी रीति) के अनुसार तत्त्व प्राप्ति के लिये नाना प्रकार के यज्ञ करते हैं, जैसे- वाजपेय यज्ञ, गोमेध यज्ञ, नरमेध, अश्‍वमेध यज्ञ आदि । कुछ आचार्य तीर्थ-तीर्थ दौड़कर पृथ्वी की परिक्रमा करते रहने को ही सिद्धि की प्राप्ति बतलाते हैं ॥१२॥
(क्रमशः)

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