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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८० =*
*= पीथा निर्वाण का भुरभुरे आना =*
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पीथा निर्वाण रूपदास वैरागी की संगति में सदा जाता रहता था । इससे वह ईश्वर भक्ति भाव को प्राणी के कल्याण में प्रामाणिक हेतु जानता था और यह भी सोचता रहता था कि वास्तविक ईश्वर की भक्ति तथा भाव ईश्वर के सच्चे भक्त संतों से प्राप्त हो सकते हैं और दादूजी उच्च कोटि के संत हैं ।
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अतः मैं भुरभुरे जाकर दादूजी का दर्शन करूंगा और यहां लाने की प्रार्थना भी करूंगा । यदि वे पधार जायेंगे तब तो बहुत अच्छा होगा । उक्त प्रकार विचार करके पीथा निर्वाण भुरभुरे गया और प्रणाम सत्यराम करके हाथ जोड़कर दादूजी के सामने बैठ गया फिर बोलने का अवकाश देखकर बोला - भगवन् ! आज आपका दर्शन कर के मेरे को महान् आनन्द प्राप्त हुआ है ।
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मैं करड़ाले ग्राम का हूँ जहां पहले आपने साधन भजन किया था मैं उस समय आपके संग से वंचित रहा किन्तु आपके वहां से पधारने पर वहां के भक्त लोग आप जहां पर्वत पर ककेड़े वृक्ष के नीचे भजन करते थे, वहां समय-समय पर जाते हैं, उस स्थानकी पूजा करते हैं । वहाँ प्रसाद भी चढ़ाते हैं, मैं इस व्यवहार को देखकर आपके नाम से परिचित हुआ हूँ ।
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जब मैंने सुना कि आप भुरभुरे में पधारे हुये हैं तब आपके दर्शन करने आया हूँ । मैं आपके दर्शन तो प्रतिदिन ही चाहता हूँ और मेरे मन में यह प्रबल इच्छा है कि आप मेरे साथ करड़ाले पधारें तो मैं बहुत ही सुख को प्राप्त हूँगा । पीथा निर्वाण की प्रेम पूर्ण प्रार्थना सुनकर दादूजी महाराज ने उनके साथ करड़ाले चलना स्वीकार कर लिया । फिर तो पीथा को बहुत हर्ष हुआ ।
(क्रमशः)

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